अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

राक्षस

दो बच्चों की माँ वत्सला ने उस समाचार को पढ़ा तो उसका मन घृणा और क्षोभ से भर उठा। "राक्षस," वह बुदबुदायी। यूँ ऐसे समाचार तो अब आये दिन आते रहते हैं और इन पर सीरियल बनाकर कुछ चैनल अच्छा-ख़ासा पैसा बना रहे हैं। ऐसे सभी ख़बरिया चैनलों के एंकर तो यही कहते हैं कि वे इन यौन अपराध कथाओं को जनता के सामने लाकर उसे सावधान करते हैं। ख़ैर, आज जो समाचार छपा था उसके अनुसार मामा ने भा~णजी को अपनी पाशविक वासना का शिकार बनाया था।

दरअसल, वत्सला को तो आज इस समाचार ने वर्षों पुरानी याद दिला दी। वह तब तेरह वर्ष की थी और एक विवाह समारोह में अपने माता-पिता और छोटे भाई के साथ ननिहाल गयी हुई थी। विवाह समारोह के दिन उसकी माँ का एक मुँह बोला भाई उसका हाथ देखने के बहाने उसे ऊपर उस कमरे में ले गया था जहाँ विवाह के लिए खाने-पीने का सामान रखा हुआ था। पहले तो वह  वत्सला के हाथ की लकीरों को लेकर कुछ बेफजूल की बातें बोलता रहा लेकिन कुछ ही देर बाद वह 'तुम बहुत ही ख़ूबसूरत हो' कहकर उसका हाथ सहलाने लगा। किंकर्तव्यविमूढ़ वत्सला अभी कुछ कहने वाली थी कि तभी विवाह में आया हलवाई वहाँ कुछ सामान लेने आ पहुँचा। वत्सला आनन-फानन में हाथ छुड़ा कर वहाँ से चलती बनी। इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी वत्सला उस घटना को न भूल पाई थी लेकिन न जाने वह संस्कारों का कौन सा पक्ष है जिसकी वज़ह से उसने आज तक यह बात किसी को भी नहीं बताई है।  

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं