अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

राष्ट्रवाद 

सत्ता की विरूदावली गाती भाषा 
और गर्दन का नाप लेते जल्लाद की मंशा
पंखा झलती बाँदियाँ हैं राष्ट्रवाद की 
राष्ट्रवाद का दिल नहीं होता 
उसके पास होती है सिर्फ़ घासलेटी भावनाएँ 
जिनको भड़काया जा सकता है 
कभी भी कहीं भी 
ये भावनाएँ किसी की भी हत्या कर सकती हैं 
अपने काग़ज़ी अहम के आहत होने पर 
बलात्कार पर हँस सकती हैं
स्त्रियों के विधर्मी होने पर 
और तो और 
बलात्कारी को परम राष्ट्रवादी साबित करते हुए 
तिरंगे को भी उसका समर्थक बना सकती हैं 


राष्ट्रवाद रक्षक है राष्ट्र का 
वह लड़ता है किसी अदृश्य शत्रु से 
ख़ुद को महसूस करता है 
युद्ध के किसी मैदान में हमेशा 
उसके पास होती है 
शत्रु के अत्याचारों की पूरी सूची 
देश के वीर सपूतों के शौर्य की 
न ख़त्म होने वाली दास्तान
हृदय में विधर्मियों से घृणा 
ज़बान पर राजा का यशोगान 
इस राष्ट्रवाद के संकेत पर 
घंटे जैसा बजता है जनगणमन  
टन टनाटन टन  

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं