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रच लेता है अक़्सर

आज का कवि
मामूली चीज़ों पर
रच लेता है अक़्सर
ग़ैर मामूली कविताएँ


मसलन
उपले थेपती
उस मरियल सी साँवली युवती को
बना लेता है
कविता की नायिका
सामने से जिसके
ख़ुशबू के झोंके की तरह
गुज़री है एक मेम
कोहनी-कोहनी तक
मेंहदी सजाये;
युवती अनजाने ही
उपले पाथना भूल
अपने में खोयी
मांडने लगती है लकीरें उसी गोबर से
और निरखती है
मेंहदी के रचाव में जैसे
उग आयीं हो फूल-पत्तियाँ


वह
उस नन्ही सी लड़की को भी
बाँध लेता है शब्द चित्र में
जो
उतनी ही नन्ही साइकिल पर
लगा रही होती है एड़
दम भरकर
पसीने से तरबतर
लड़के आगे निकल गए हैं
वह निकल जाना चाहती है उनसे भी आगे


कवि
उस लड़के को भी नहीं भूल पाता
जिसकी उम्र है अभी पढ़ने की
मगर
सौंप दी है पिता ने ज़िम्मेदारी
ज़िन्दगी से लड़ने की
वह चाय बेचता है
और ग्राहकों को लुभाने के लिये
निकालता है तरह-तरह की आवाज़ें
कौए, मोर, शेर की
कभी-कभी
फोन की घंटियाँ भी बज उठती हैं
उसके कंठ में,
चुस्कियाँ लेते हुए हँसते हैं ग्राहक
कवि हँस नहीं पाता
रचता है कविता


प्रायः ऐसा भी होता है
कि
दुनिया जहान में भटक कर
जब वह
शाम को पहुँचता है घर
पत्नी की आँखों में
भिंडी, बैंगन और टमाटर की तरह
उगे दिखाई देते हैं
अनगिनत प्रश्न
वह खिसियाकर
गुनगुनाता है एक रोमांटिक सी कविता
किचन की तरफ मचलती पत्नी को
बाँहों मे भरने की
करता है निष्फल चेष्टा
न जाने क्यों अचानक
भर्रा जाता है गला उसका
गोया रोमान्टिक कविता की ठौर
सुना रहा हो कोई शोकगीत


जो कवि
रचता रहा है अक्सर
मामूली चीज़ों पर ग़ैर मामूली कविताएँ
इस दृश्य को
लाख कोशिश के बावजूद
नहीं ढाल पाता शब्दों में
जैसे यह कोई
ग़ैर मामूली अनुभूति हो
लेखनी से परे
शब्दों के पार

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