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रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’ - 1

दोहे

1.
जीवन में दुर्लभ रहा, मधुर, मिलन, संयोग।
वे दो पल को क्या मिले, मिला स्वर्ग का भोग॥

2.
मन- दर्पण था झील -सा,  निर्मल-पावन प्यार।
अँजुरी भर-भर कर पिया,तेरा यह उपहार॥

3.
इतनी विनती आज है,मेरे प्राणाधार।
रोम रोम में तुम रहो,बन साँसों का सार॥

4.
कौन कहाँ तक चल सका, कौन रहेगा दूर।
जीवन के दो घूँट को,कंठ हुआ मजबूर॥

5.
साँसों पर अब हर घड़ी, होता है प्रहार।
मरना ही आसान है, जीना अब दुश्वार॥

6.
बहुत हुआ अब तो चलो, नील गगन के पार।
यहाँ नफ़रत के साँप है, डँसने को तैयार॥

7.
हम पाखी थे डाल के,जड़ -चेतन से प्रीत।
लोग हमें समझे नहीं, जिनकी छल- बल रीत॥

8.
बाँचेगा कोई नहीं, आँसू भरी किताब।
अन्धे घेरे हैं तुम्हें,अन्धे उनके ख़्वाब॥

9.
दुनिया नदिया ताप की, डूबो, करलो पार।
अम्बर तक तैयार है, लेकर सब हथियार॥

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