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साल के जाने पर

एक और साल बीत गया था
पूरे तीन सौ पैंसठ दिन का साल
उस पूरे साल में कितनी बार उसने ख़ुद से कहा था
कि अब वह और वक़्त ज़ाया नहीं करेगा
कि वह लगातार मनायेगा जीवन का उत्सव
कि वह बार बार नदी की उफनती धारा में छोड़ देगा ख़ुद को
कि वह सागर के तट की गीली रेत पर लिखेगा
अपनी पसंद के नाम
कि वह ज़ोर से चिल्लायेगा
अपने ही घर की छत पर खड़ा होकर
और ख़ुद से कहेगा उसके साँसों में है
ढेर सी हवा
जिसे तबीयत से बाहर छोड़ते ही
भीतर भर जायेगी चमकीली ख़ुशबू
कि वह बार बार करेगा प्रेम
दुनिया में फैली घृणा के बावजूद
कि वह हर बार जीवन के जादू को नयी
आवाज़ के साथ बुलायेगा।
तब कैलेंडर के पन्ने पलटने के रोज़नामचे से
वह हो सकेगा आज़ाद
और साल बीतने के बाद नहीं ज़रूरत रहेगी
उसे ख़ुद से कोई वादा करने की
उसके तीन सौ पैंसठ दिन
और उन से बना पूरा एक साल
किसी डायरी का हिस्सा नहीं होंगे
और किसी कैलेंडर का भी नहीं
वह रोज़ नये दिन को यूँ ही धारण करेगा
जैसे आत्मा पुराना चोला उतार कर
नया धारण करती है
तब सुबह के स्नान के साथ वह
दोहरायेगा गीता के दर्शन का यह बड़ा मंत्र
नैनम् छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनम् दहति पावक:
और ज़िंदगी को कर देगा
मौत के डर से आज़ाद
तब मौत भी आत्मीय लगेगी उसे
वह बार बार ज़िंदगी पर बँधी
अनदेखी रस्सियों को खोलेगा
हर रोज़ एक नये जन्म का मनायेगा उत्सव
यूँ जन्मदिन मनाना नहीं रहेगी एक रस्म
वह रस्म जैसी ज़िंदगी से निकलकर
ख़ुशबू, जादू और प्रेम के बीच नहीं सोचेगा
कि चला गया है साल
क्योंकि फिर साल ठहर जायेगा उसकी ज़िंदगी में
हमेशा के लिए
और वह साल को उठाकर अपनी
कविता में रख लेगा।

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