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साँझे सपने

पिछली बार प्याज को रोड़ी में फेंकना पड़ा। मगर, इस बार भाव अच्छे थे, "बाबा! इस बार तो मुझे नया मोबाइल दिला दोगे ना?" कालेज में पढ़ने का सपना देखने वाले छोटे लड़के ने पूछा तो उस की माँ बोली, "पहले छुटकी का ब्याह करना है। उस के लिए गहने-कपड़े लेने होंगे।"

"नहीं माँ! पहले अपना कमरबंद और सोने का हार सुनार के यहाँ से वापस ले आइएगा। फिर मेरा ब्याह करने की सोचिएगा।"

"तब तो पहले बाबा के लिए, मोटर साइकिल ख़रीदनी चाहिए। बाबा को रोज़ पाँच किलोमीटर दूर खेत पर पैदल जाना पड़ता है।"

"नहीं रे! मुझे नहीं चाहिए। पैदल जाने से सेहत अच्छी रहती है," बाबा ने बीड़ी पीते हुए कहा। "पहले तेरा नया मोबाइल आ जाए और छुटकी का ब्याह हो जाए तो समझे की गंगा नहा गए," बाबा ने यही बोला था कि पुराने मोबाइल की घंटी बज उठी। शहर में नौकरी करने वाले बड़े भाई का फोन था। जिसे सुन कर बाबा के चेहरे का रंग बदल रहा था।

"भैया! यह खेत आप का भी है। मुझे खर्चा-पानी नहीं चाहिए। आप, अपने हिस्से का माल-पानी ले जाइएगा।" कहते ही बाबा को गत वर्ष रोड़ी में फेंके गए प्याज और अपने ऊपर पड़े सभी हर्ज़े-ख़र्चे की याद आ गई जब इन्हीं भाई साहब ने कहा था, "भाई! मुझे न तो प्याज की कमाई से हिस्सा चाहिए और न मैं ख़र्च-पानी दूँगा।"

यह सुनते ही सभी को एक-दूसरे के सपने धुँधले होते हुए दिखाई दे रहे थे।

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