अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सभी चोर हैं तो

सौरभ जी और दीपक जी एक-दूसरे के घर आते-जाते रहते हैं। दोनों ही कुछ वर्ष पहले साठ वर्ष की आयु पर पहुँचने पर सेवानिवृत हुए थे। ख़ैर, कोई दो महीने पहले सौरभ जी जिस वक़्त दीपक जी के घर पहुँचे तो उस वक़्त वे अपने बैठक के कमरे में दीवारों पर लगी फोटुओं को उतार रहे थे। पास जाकर उन्हें मालूम हुआ कि वे बीते वक़्त के राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीरें थी। इससे पहले सौरभ जी कुछ पूछते, ख़ुद दीपक जी बोल उठे थे, "अब जाकर पता लगा कि ये सभी चोर थे। ऐसे लोगों की तस्वीरें टाँगे रखना तो अव्वल दर्जे की बेवकूफ़ी थी।" बहरहाल, उसके बाद दीपक जी ने कोने में मेज़ पर रखी फोटुओं को अपनी दीवारों पर टाँगना शुरू किया। इस वक़्त के तीन बड़े नेताओं की तस्वीरें थी। ख़ैर, संयोगवश आज जिस वक़्त सौरभ जी जी दीपक जी से मिलने पहुँचे तो देखा कि अब वे दो महीने पहले टाँगी गई तस्वीरों को उतार रहे थे। इस बार भी दीपक जी ख़ुद ही बोल उठे, "पुरानी पार्टी से जुड़े नेताओं का कहना है कि ये लोग भी दूध के धुले नहीं हैं। मैंने सोचा जब सभी चोर हैं तो फिर किसी की भी फोटो क्यों लगाई जाए?"

इसके बाद उन्होंने कोने की मेज़ पर रखी नई फोटुओं को दीवारों पर लगना शुरू कर दिया। वे सभी जानवरों की तस्वीरें थी।

उनको टाँगने के बाद वे हँसते हुए बोले, "इनको कोई चोर नहीं कहेगा। मेरी सरदर्दी ख़त्म हुई।"

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं