अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सच्चाई (पाराशर गौड़)

इतिहास के पन्ने बोलेंगे
आज नहीं तो कल
राज़ वो तेरा खोलेंगे..।


तेरे एटम के आगे वैसे
कुछ भी नहीं मेरी क़लम,
वार दोनों करेंगे मित्र
किसीकी होगी चोट ज़्यादा
तो होगी किसीकी कम
ये तो वक़्त ही बतलायेगा
जब हम तुम ना रहेंगे..।


बच्चों का रुदन, माँ का दर्द
नहीं तुझे सुनाई देता
तेरी ज़्यादती के आगे
आज ईश्वर भी है रोता
तू भी रोयेगा एक दिन
दिन जब वो आयेंगे...।


तेरी चोट के घाव तो
भर जायेंगे, मेरे रहते रहते तक
मेरी क़लम की चोट
वो तो रहेगी सदियों सदियों तक
मैं जो लिखूँगा, लिख जाऊँगा
उसकी मार, मेरे यार
एटम से भी ज़्यादा होगी...।


ना रही नादर की नादरशाही
ना ही रोमन, रोम की
जिस ज़ख़ीरे के सहारे है तू खड़ा
देख लेना यही बनेगी 
एक दिन तेरी तबाही
दूर से देखेंगे लोग तमाशा तेरा
तब तुझपे रोने वाले कोई न होंगे


हम न रहेंगे ना सही
लिखा हमारा रहेगा
आईना होगा ये कल का
जिसमें घटनाओं का ज़िक्र होगा
प्रयास हमारे ये..
कल की धरोहर होंगे...।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

हास्य-व्यंग्य कविता

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

प्रहसन

कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं