अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य ललित कला

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सललि - दोहे

अजर अमर अक्षय अजित, अमित अनादि अनंत।
अनहद नादित ॐ ही, नभ भू दिशा दिगंत।

प्रणवाक्षर ओंकार ही, रचता द्रिष्ट-अदृष्ट।
चित्र चित्त में गुप्त जो, वही सभी का इष्ट।

चित्र गुप्त साकार हो, तभी बनें आकार।
हर आकार-प्रकार से, हो समृद्ध संसार।

कण-कण में बस वह करे, प्राणों का संचार।
हर काया में व्याप्त वह, उस बिन सृष्टि असार।

स्वामी है वह तिमिर का, वह प्रकाश का नाथ।
शान्ति-शोर दोनों वही, सदा सभी के साथ।

कंकर-कंकर में वही शंकर, तन में आत्म।
काया स्थित अंश का, अंशी वह परमात्म।

वह विदेह ही देह का, करता है निर्माण।
देही बन निष्प्राण में, वही फूंकता प्राण।

वह घट है आकाश में, वह घट का आकाश।
करता वह परमात्म ही, सबमें आत्म-प्रकाश।

वह ही विधि-हरि-हर हुआ, वह अनुराग-विराग।
शारद-लक्ष्मी-शक्ति वह, भुक्ति-मुक्ति, भव त्याग।

वही अनामी-सुनामी, जल-थल-नभ में व्याप्त।
रव-कलरव वह मौन भी, वेड वचन वह आप्त।

उससे सब उपजे, हुए सभी उसी में लीन।
वह है, होकर भी नहीं, वही 'सलिल' तट मीन।

वही नर्मदा नेह की, वही मोह का पाश।
वह उत्साह-हुलास है, वह नैराश्य हताश।

वह हम सब में बसा है, किसे कहे तू गैर।
महाराष्ट्र क्यों राष्ट्र की, नहीं चाहता खैर?

कौन पराया तू बता?, और सगा है कौन?
राज हुआ नाराज क्यों ख़ुद से? रह अब मौन।

उत्तर-दक्षिण शीश-पग, पूरब-पश्चिम हाथ।
ह्रदय मध्य में ले बसा, सब हों तेरे साथ।

भारत माता कह रही, सबका बन तू मीत।
तज कुरीत, सबको बना अपना, दिल ले जीत।

सच्चा राजा वह करे जो हर दिल पर राज।
'सलिल' झुकें तभी चरणों झुकें, उसके सारे ताज।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अर्थ छिपा ज्यूँ छन्द
|

बादल में बिजुरी छिपी, अर्थ छिपा ज्यूँ छन्द।…

अक़्सर ये है पूछता, मुझसे मेरा वोट
|

  पंचायत लगने लगी, राजनीति का मंच।…

अख़बार
|

सुबह सुबह हर रोज़ की,  आता है अख़बार।…

अफ़वाहों के पैर में
|

सावधान रहिये सदा, जब हों साधन हीन। जाने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

साहित्यिक आलेख

दोहे

कविता

पुस्तक चर्चा

कविता - हाइकु

पुस्तक समीक्षा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं