अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

समय की शिला पर


वह कर्ज ले रहे हैं।
मन्दी में चिकित्सक भी
बीमार हो रहे हैं॥
 
आदर्श की दुकानें
अब और न चलेंगी।
बुजुर्गों छोड़ो कुर्सी
अब युवा आ रहे हैं॥
 
अनपढ़ गँवार सा जो
नेता कहा रहे हैं।
जो तैर नहीं पाते
नौका चला रहे हैं॥
 
जिनपर था नाज हमको
हिंसा बढ़ा रहे हैं।
मैंगलोर में रावण
सीता भगा रहे हैं॥
 
जैसे आतंक पीछे,
छिपकर खड़ा है ऐसे,
मुँह में लगी कालिख,
दर्पण छिपा रहे हैं॥
 
आतंक डर दिखाकर
किसको डरा रहे हैं।
वह देश के हैं शत्रु
मुम्बई जला रहे हैं॥
 
चोर, डाकू अचानक
बन गये हैं जेहादी।
लूट का नया नारा,
कब से चला रहे हैं॥
 
कैसी दुनिया है यह
स्वतन्त्रता नहीं है।
बरताव एक जैसा
समता जहाँ नहीं है॥
 
भटके हुए जवानो
अब तो लौट आओ।
अलगाव माउवादी,
जीवन जला रहे हैं॥
 
मेरी कलाई में जो
कंगना बन गये हैं॥
तुलसी चौरे रचकर
अंगना बन गये हैं॥
 
अपना जिन्हें बनाया
सपना बन गये हैं।
हैवान इस हृदय में,
इनसान बन रहे हैं॥

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

लघुकथा

कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं