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पति के चेहरे पर निराशा के भाव देखकर पत्नी ने कहा, "आज भी किसी ने नहीं सुनी! मैं कहती हूँ छोड़ो ऑफ़िस का चक्कर। साग रोटी से ही दिन कट जायेंगे।"

"पहले एक ग्लास पानी तो पिलाओ, कड़ी धूप से आया हूँ। भरोसा रखो," छाता और फ़ाइल रखते हुए राजेंद्र बाबू ने कहा।

पत्नी ने पानी देते हुए कहा, "किसी को रहम नहीं आता आपके कमज़ोर शरीर को देखकर। महीनों से चक्कर लगा रहे हैं अपनी पेंशन के लिए। लोग भूल गए आपके पांडित्य, समय-निष्ठा और ईमानदारी को। तीस साल शिक्षक रहे, कभी छुट्टी नहीं ली," पत्नी ने अफ़सोस ज़ाहिर किया।

पति कुछ कहने ही वाले थे कि लगा दरवाज़े के बाहर कोई गाड़ी आकर रुकी।

गाड़ी से एक युवक उतरा और राजेंद्र बाबू को प्रणाम करते हुए कहा,"सर क्षमा करेंगे, आपको बहुत परेशानी उठानी पड़ी।"

राजेंद्र बाबू कुछ समझ नहीं पा रहे थे।

युवक ने कहा, "राँची से फोन आया है, आपको शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में सरकार सम्मानित करने जा रही है।"

"और इनकी पेंशन?" पत्नी ने जानना चाहा।

"निश्चिंत रहे। सर के छात्र सचिवालय में पदाधिकारी हैं, उनका फोन आया था। सर ने कभी बताया नहीं।"

पति पत्नी के चेहरे पर ख़ुशी झलक उठी।

"सर! यह है सरकार की चिट्ठी। आप कल ही मेरे ऑफ़िस आएँ, सारे काग़ज़ात के साथ; डीईओ साहब ने मुझे आपके पास भेजा है।"

युवक के जाने के बाद पत्नी ने पूछा, "कौन थे ये?"

पति ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "डीईओ साहब के ऑफ़िस के बड़े बाबू थे।"

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टिप्पणियाँ

पाण्डेय सरिता 2021/09/16 11:53 AM

बहुत बढ़िया

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