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संवेदनाओं की जड़ की गहरी तलाश : उषाकिरण खान की कहानियाँ

उषाकिरण खान बिहार के मिथिलांचल की रहने वाली हैं। उन्होंने वहाँ के समाज और संस्कृति को बहुत क़रीब से देखा है जिसके कारण उनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन के साथ साथ वहाँ के समाज की संस्कृति की झलक भी दिखलाई पड़ती है। इनकी कहानियों से अविभाजित बिहार के मिथिलांचल के मिट्टी की सुगन्ध आती है। ग्रामीण संस्कृति से जुड़ी होने के कारण उनकी कहानियाँ संवेदनात्मक स्तर पर बहुत ही समृद्ध हैं। उन्होंने अपनी कहानियों के सम्बन्ध में गोपाल राय को लिखे पत्र में लिखा हैं कि, "अपने जीवनानुभव से मैंने समाज में जो देखा, उसी को कहानियों का विषय बनाया।"1

जीवन के अनुभवों से जुड़ी होने के कारण भी उषाकिरण खान की कहानियाँ सम्वेदनात्मक हो गई हैं। 

'दूब-धान' उषाकिरण खान की 'सिग्नेचर' कहानी है। यह कहानी गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल है। कहानी की मुख्य पात्र केतकी है जिसके चार भाई हैं। जो गाँव छोड़कर शहरों में अच्छी नौकरी करते हैं। केतकी को बड़े भाई का पत्र मिलता है जिसमें यह सूचना होती है कि बड़े भाई समीर के बेटे का जनेऊ है। पत्र के माध्यम से उसे गाँव आने का न्योता मिलता है। केतकी अपने पति के साथ ट्रेन से गाँव जाती है। रास्ते में उसे सबुजनी की याद आती है जो मुस्लिम होते हुए भी जीतिया और छठ करती थी। स्टेशन पर चेचेरा भाई गाड़ी से लेने आता है। घर पहुँचकर चचेरा भाई रात होने के कारण कहता है, "तुम लोग सो जाओ सुबह सबसे मुलाक़ात होगी।"2 केतकी को गाँव के लोगों के व्यवहार में हुए परिवर्तन को देखकर आश्चर्य होता है। उसे लगता है, "बेटी के आने पर प्रतीक्षारत बैठे कहाँ गए स्वजन-पुरजन, कहाँ है जुड़ाने को रखा हुआ बड़ी-भात और कहाँ गई वह परंपरा जिसमें पहले देवी की विनती किए बिना किसी घर में नहीं रखा जा सकता था।"3

दरअसल केतकी बचपन से ग्रामीण संस्कारों में पली-बढ़ी शिक्षित लड़की थी इसलिए उसे ग्रामीण रीति-रिवाज़ों से प्रेम था। वह चाहती थी कि ससुराल से नैहर आने के बाद उन्हीं ग्रामीण रीति-रिवाज़ों का पालन किया जाय जो अन्य लड़कियों के ससुराल से आने के बाद पहले किया जाता था। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होता है। जनेऊ के दौरान, "कोई काम किया जा रहा था, ऐसा नहीं लग रहा था, ऐसा लग रहा था मानो सारा काम आप-से-आप से हो रहा हो।"4 यह आधुनिक समय की सच्चाई है। आज काम 'इवेंट मैनेजमेंट' वालों को ठेके पर दे दिया जाता है। रुपया फेंको तमाशा देखो वाली स्थिति है। घर परिवार के लोगों को काम नहीं करना पड़ता है। पहले की स्थिति ऐसी नहीं थी। महीनों पहले से गाँव में किसी उत्सव की तैयारी होती थी। काम आसपास के लोगों को बाँट दिया जाता था। पूरा मुहल्ला मिलकर काम करता था जिससे लोगों में प्रेम और सौहार्द बढ़ता था। आज लोगों के पास उतना समय नहीं है कि महीनों पहले से तैयारी करे। लोगों के पास रुपये हैं जिसे ठेके वालों को देकर काम से छुट्टी पा जाते हैं। इसके कारण लोगों में सौहार्द और प्रेम की भावना घटी है।

जनेऊ के बाद 'केतकी' भाभी से आज्ञा लेकर एक छोटी लड़की के साथ गाँव देखने निकल पड़ती है और सबसे पहले फुलवारी जाती है। वहाँ जाकर बचपन की यादों में खो जाती है। लौटते समय खेतों में बैल की जगह ट्रैक्टर को चलते हुए देखती है और मन ही मन नचारी गुनगुनाने लगती है :

"अमिय चुबिय भूमि खसत, बाघम्बर जागत है
आहे होयत बाघम्बर बाघ, बसहा घरि खायत है।"5

उपर्युक्त पंक्तियों के अर्थ है कि जब पार्वती, शिव को नृत्य करने के लिए कहती है तो अपने डर को बतलाते हुए शिव, पार्वती से कहते हैं कि उनके द्वारा नाचने से अमृत-बूँदें बाघम्बर पर गिरेंगी और बाघम्बर बाघ बन जाएगा और बसहा बैल को खा जाएगा। आज विज्ञान शिव तांडव कर रहा है। विज्ञान का ही आविष्कार 'टैक्टर' है। जिसने बैलों को बेकार बना दिया है। आज कोई भी किसान बैल को रखना नहीं चाहता। विज्ञान का शिव तांडव आख़िरकार बैलों को खा ही लेता है और उपर्युक्त लोकोक्ति सच हो जाती है। यहाँ उषाकिरण खान आधुनिकता की आँधी में बहते समाज पर चिन्ता ज़ाहिर करती हैं। केतकी को अमृत-बूँद से लगा यंत्रव्याघ्र (ट्रैक्टर) का गर्जना ज़्यादा प्रभावित नहीं करता क्योंकि उसे गँवईपन पसन्द था, आधुनिकता नहीं। 

गाँव के बदलाव को देखकर वहाँ 'केतकी' का मन नहीं लगता है। वह रात में पति से कहती है, "कल चलते हैं ना हम लोग?"6 इस पर पति कहता है, "क्यों, तुम तो कुछ और दिन रुकने वाली थीं?"7 इस पर वह कहती है कि, "नहीं चलूँगी।"8 पति चलने के लिए तैयार हो जाता है। 

अगले दिन विदाई के समय केतकी भाई-भाभियों का चरण-स्पर्श कर सूखी आँखों से गाड़ी में बैठ जाती है और गाड़ी चल पड़ती है। केतकी एकाएक गाड़ी रोकने को बोलती है। वह उतर कर सरोजनी दीदी से मिलने उनके घर पहुँच जाती है। मिलने पर सरोजनी दीदी हर्ष के साथ कहती है, "अच्छा हुआ, ग्राम-समाज को देखने आ गई। तू बिना माँ की बेटी हम सबकी बेटी। अरे, कहाँ गई सुलेमान की कनिया, ज़रा सोना-सिंदूर ले आ, केतकी की माँग भर। एक चुटकी धान-दूब ले आ, खोइंछा भर दे।"9 इसके आगे की स्थिति का वर्णन करती हुई कहानीकार उषाकिरण खान लिखती है, "भीड़ जैसा समा हो गया था। एक बहू दौड़कर अंदर से सारा सामान ले आई। भाभी तो खोइंछा देना भी भूल गई थीं। रेशमी आँचल की खूँट आप-से-आप खुल गई। दूब-धान के लिए मन उदास था।"10

पाठकों के लिए यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि खोइंछा मिथिलांचल में पुराने ज़माने से चली आ रही एक प्रथा है। 

खोइंछा को सौभाग्य ,सृजन और हरीतिमा का प्रतीक माना जाता है। इसमें लड़कियों (बहू-बेटी) के आंचल में दूब दी जाती है, ताकि उनका सौभाग्य बार-बार फिर से पनपे। दूब हरीतिमा (भरा पूरा परिवार) और अमरत्व का प्रतीक है क्योंकि वह नष्ट होकर फिर से उग जाती है इसलिए खोइंछा में दूब डाला जाता है। 

खोइंछा में हल्दी भी डाली जाती है। हल्दी में रोग-विनाशक शक्ति होती है। हल्दी सौंदर्य प्रसाधन की भी सामग्री है। अर्थात हल्दी कन्या के निरोग रहने और सौन्दर्य प्राप्त करने का प्रतीक है। खोइंछा में हल्दी इसलिए डाली जाती है जिससे लड़की निरोग रहे और उसके पीले सौंदर्य को पा सके और हल्दी की गाँठों के समान परिवार पर उसकी पकड़ रहे एवं हल्दी के समान ही वह अपने घर-परिवार में कारगर बन सके। 

खोइंछा में धान भी दिया जाता है। ग्रामीण भाषा में इसे नूनार भी कहते हैं। पहले धान को खेत में काटने के बाद उसे फटकने के दौरान जो बीज गिरते थे उसी से खेत में अगली बुआई होती थी। पहले धान के बिचड़े नहीं रोपे जाते थे। कुछ जगहों पर उसे बवार भी कहा जाता है। आज की पीढ़ी शायद ही नूनार और बवार जैसे शब्दों को जानती होगी। धान अखण्ड सौभाग्यवती होने का प्रतीक है। खोइंछा में धान इसलिए डाला जाता है जिससे कन्या सदा अखण्ड सौभाग्यवती बनी रहे। यह उत्तर वैदिक काल से चली आ रही लौकिक परम्परा है क्योंकि वैवाहिक परम्परा की शुरुआत तभी से मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि कालान्तर में इसमें सिंदूर और नकद का भी चलन हो गया होगा। ऐसा भी हो सकता है कि हमारी अगली पीढ़ी शायद खोइंछा का अर्थ भी नहीं जाने। दुर्गापूजा में देवी माँ का भी खोइंछा भरा जाता है। कहानी में केतकी का मन खोइंछा न मिलने पर उदास हो जाता है क्योंकि वह जानती है कि हमारी परंपराएँ जड़ नहीं हैं बल्कि प्रत्येक परम्परा के पीछे तत्त्व छुपा है। 

आज के समय में खोइंछा में धान और चावल दोनों का प्रयोग होता है। जो किसान नहीं होते उनके घर में धान आसानी से सुलभ नहीं होता है। अरवा चावल लगभग प्रत्येक घर में खाने के लिए होता है इसलिए धान की जगह चावल का प्रयोग किया जाता है। चावल को 'अक्षत' भी कहा जाता है। 'अक्षत' का अर्थ है जिसका 'क्षति' या 'नुकसान' न हो। धान की तरह चावल भी लड़की के अखण्ड सौभाग्यवती होने का प्रतीक है। धान से चावल ही निकलता है यानी दोनों में समान तत्व होते हैं। धान का भी उपयोग लोग घर में ही करते हैं। धान से घर के लोग चावल निकाल कर खा जाते हैं और धान के छिलके को गाय-बैल (पालतू-पशुओं) को खाने दे देते हैं। कुछ लोग धान की भूषि बनाकर अन्य खाद्य पदार्थों के साथ मिलाकर खा जाते हैं। 

कुछ जगहों पर खोइंछा में धान की जगह जीरा भी दिया जाता है। जीरा का प्रयोग कालान्तर में होना शुरू हुआ है लेकिन नियमतः धान या चावल ही पुराने रीति के अनुसार मान्य है। 

एक बात और पाठकों के लिए बतला देना चाहता हूँ कि खोइंछा खोलने का अधिकार सभी के पास नहीं होता है। लड़की जब मायके या पीहर या नैहर से खोइंछा लेकर ससुराल आती है तो बहू की ननद (बड़ी या छोटी सबका हक़ होता है) या गोतनी (बड़ी या छोटी सबका हक़ होता है) उसे खोलती है। उसमें जो रुपये होते हैं उसपर ननद या गोतनी का (खोइंछा खोलने वाले का) अधिकार होता है। अमीर लोग रुपये की जगह सोना या चाँदी भी खोइंछा में डालते हैं। रुपये या सोना-चाँदी पर अधिकार ननद या गोतनी का रहता है। बहू जब ससुराल से मायके या पीहर या नैहर जाती है तो खोइंछा खोलने का अधिकार भाभी (बड़ी या छोटी सबका हक़ होता है।) या बहन (बड़ी या छोटी सबका हक़ होता है।) का होता है। रुपये या सोना-चाँदी पर अधिकार भाभी या बहन (खोइंछा खोलने वाले का) का ही होता है। 

खोइंछा देने के बाद सरोजिनी मेहमान (दामाद) के लिए कमर से निकालकर दो रुपये का मुड़ा-तुड़ा नोट पौती में बंद कर केतकी के हाथों में देते हुए कहती है, "यह मेहमान का सलामी है, दे देना। गुड़ खा ले बेटा, पानी पी ले। ज़रा ठीक से। हाँ, जा गाड़ी को देर हो रही है। देख लिया तुझे, सुख-चैन से मरूँगी।"11

मिथिलांचल में यह प्रथा है कि मेहमान (दामाद) को ख़ाली हाथ नहीं विदा किया जाता है। केतकी का भाई सक्षम होते हुए भी अपने बहनोई को ख़ाली हाथ विदा करता है लेकिन सबुजनी ग़रीब मुस्लिम होते हुए भी हिन्दुओं के सारे रस्म-रिवाज़ों को निभाती है और मेहमान के लिए दो रुपये देती है। इस जगह यह कहानी हिन्दू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी संस्कृति की कहानी बन जाती है। 
केतकी भावुक होकर सबुजनी के कांधे पर अपना सिर टेक देती है और इतने दिनों का जमा आँसुओं का बाँध टूट पड़ता है। सबुजनी केतकी की पीठ को हौले-हौले सहलाते हुए कहती है, "रो ले, बेटी रो ले, मन में कुछ ना रखना, कहा-सुना छिमा करना, गाँव-जवार को असिसती जाना।"12

"लाल रंग डोलिया सबूज रंग ओहरिया आब बेटी जाई घर विदेश।"13

केतकी मुश्किल से अलग होकर ससुराल जाने के लिए पगडंडी पार करने लगती है। 

यह कहानी अत्यंत मार्मिक और लोक-रीति पर आधारित है। उषाकिरण खान इस कहानी के माध्यम से बिहार के मिथिलांचल की संस्कृति से लोगों को अवगत कराती हैं। उन्होंने इस कहानी के माध्यम से लोगों को सचेत भी किया कि आधुनिकता की आँधी हमें हमारी परंपराओं से किस तरह अलग कर रही है। इस कहानी में उन्होंने इस मुद्दे को उठाया है कि आधुनिकता के चक्कर में लोग कैसे अपनी लोक संस्कृति और लोक परंपरा को भूलते जा रहे हैं। कहानी में उन्होंने इस बात को दिखलाया है कि नई पीढ़ी संवेदना के स्तर पर कमज़ोर हुई है और उन्हें गाँव की संस्कृति और परंपरा से कोई मतलब नहीं है। पहले लोगों के पास पक्की छत और ज़्यादा रुपये नहीं थी लेकिन संवेदनात्मक रूप से जुड़े होने के कारण उनमें प्रेम था और अब घर की छत पक्की है, सुख-सुविधाओं के साधन मौजूद हैं लेकिन प्रेम और लगाव दिनों-दिन कम होते जा रहे हैं। 

'अम्माँ, मेरे भैया को भेजो री, कि सावन आया' एक ऐसी कहानी है जिसमें 'इशहाक शेख' का बड़ा लड़का 'अजीज शेख' गाँव से शहर आकर आतंकवादी बन 'बम ब्लास्ट' करता है और कई लोगों को मौत की नींद सुला देता है। सबसे पहले उसकी बहन 'रजिया' को इस बात की जानकारी टी.वी न्यूज़ चैनल में नीचे लिखी इबारत पढ़ने से मिलती है, "उत्तर बिहार की नेपाल सीमा से अजीज शेख नामक कुख्यात आतंकवादी पकड़ा गया।"14 लड़के का पिता 'इशहाक शेख' अच्छा खिवैया और तैराक थे। उन्होंने एक बार कई लोगों की जान बचाई थी। उषाकिरण खान ने लिखा है, "एक बार जिसी नाव पर सवार ढेरों काँवड़ियों को लेकर नाव भँवर में फँस गई, कई बचा ली गईं इशहाक शेख के द्वारा।"15 यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि लोग सावन के महीने में ही काँवर लेकर भोले शंकर पर जल चढ़ाने जाते हैं। यह अजीब विडंबना है कि जिसका पिता कई महिलाओं के सावन (पति) की रक्षा करता है। उसी का पुत्र अनेकों महिलाओं के सावन को उजाड़ देता है। 

आतंकवादी 'अजीज शेख' की बहन 'रजिया' तय करती है कि, "भाई मिलेंगे तो पूछूँगी - कितनों के सावन को जलाकर राख कर डाला, हरदिल अजीज शेख? काँवड़ियों को बचाने में डूब जाने वाले इशहाक शेक का जाया!"16

यह कहानी उत्तर बिहार के अंचल की कहानी है और शहर और गाँव दोनों जगहों पर चलती है। संवेदना के स्तर पर यह समृद्ध कहानी है। समय बीतने के साथ-साथ भारत की गंगा-यमुना संस्कृति के विघटन की कहानी है। हिन्दू और मुस्लिमों के बीच ख़त्म होते भाईचारे की कहानी है। आज धर्म के नाम पर भाई अपने ही देश की बहनों का सावन कैसे नष्ट करता है इस बात का आख्यान यह कहानी कहती है। इस कहानी के माध्यम से उषाकिरण खान ने लोगों की मरती हुई संवेदना को उजागर किया है। 

'हमके ओढ़ा द चदरिया हो, चलने की बेरिया' कहानी एक ग्रामीण किसान के संघर्षमयी जीवन और धर्म के ठेकेदारों द्वारा धर्म के नाम पर किसान के बच्चे को लूटने की कहानी है। यह कहानी ग्रामीण जीवन को आधार बनाकर लिखी गई है जिसमें 'कोकाई' नाम का कबीरपंथी मेहनती किसान रहता है जो खेत में 'ठनका' गिरने से मर जाता है। दाह संस्कार के बाद उसके बेटों ने भंडारे का आयोजन किया। बारहवीं के भोज के बाद वह साधुओं से पूछता है, "साहब हम ऋण से उऋण हुए कि नहीं?"17 उत्तर में साधु कहते हैं, "नहीं रे फेंकना, तेरी ऋण मुक्ति कहाँ हुई? गोसाईं साहब ने दो साल पहले पचहत्तर मुंड साधु का भोज दंड दिया था। नहीं पूरा कर पाया बेचारा। यह तो तुम्हें ही पूरा करना पड़ेगा। उऋण होना है तो यह सब करना पड़ेगा।"18 इस तरह बेटों के ना चाहने पर भी साधु उसे अपने जाल में फँसा लेते हैं। मजबूरन कर्ज़ लेकर फिर पचहत्तर मुंड साधुओं को वह खिलाता है। बड़ा लड़का छोटे भाई को माँ के साथ छोड़कर बनारस जाता है क्योंकि उसे पिता के भंडारे में हुए कर्ज़ को उतारना था, "बनारस में डबल शिफ्ट रिक्शा चलाता फेंकन हलकान होकर कबीर चौरा पर सो जाता है कुत्ते की नींद और जागता है बिल्ली की नींद। कीर्तन के उदास स्वर हवा में तैरते रहते हैं - 'हमके ओढ़ा द चदरिया हो...' रिक्शे पर पैडल जोर से मारने लगता है फेंकन - कर्ज की कई किस्तें बाकी हैं।"19

यह कहानी एक किसान के बेटे को रिक्शा चालक बनने की कहानी है। सम्वेदना के स्तर से यह कहानी धर्म के ठेकेदारों की पोल खोलती है। कबीर जीवन भर रूढ़ियों का विरोध करते रहे। उन्हीं के पंथ के साधू धर्म के नाम पर कैसा खेल खेलते हैं? इस बात को यह कहानी उजागर करती है। धर्म के ठेकेदार साधुओं की मरती हुई सम्वेदना को भी यह कहानी दिखलाती है। 

'कौस्तुभ स्तंभ' एक ऐसी कहानी है जो बिहार के कोसी क्षेत्र में प्रत्येक साल आने वाली बाढ़ की विभीषिका को दिखलाती है। आमजन के लिए बाढ़ प्रत्येक साल परेशानी लेकर आती है। नेता हेलीकॉप्टर से बाढ़ का मुआयना करते हैं। राहत के नाम पर उन्हें खाने-पीने की चीज़ों को उपलब्ध करवाते हैं। इस कहानी में शाम होते-होते गाँव के लोग नाव से सुरक्षित जगह पर जाते हैं। गाँव में दो लोग छूट जाते हैं। एक कुम्हार जाति की 'मंगल बहू' और दूसरी 'देवी माँ'। रात होने के कारण नाविक को फिर आने को नहीं कहती है क्योंकि रात में उसकी जान को भी ख़तरा होता। रात भर छप्पर की मुँडेर पर बैठी रहती हैं। दोनों रात भर साँप बिच्छूओं के साथ बैठे-बैठे अपने बीते समय को याद करते रहते हैं। इसी दौरान देवी माँ सोचती है, "हुँह, अपने लोगों की चुनी हुई सरकार। अपना नुमाइंदा, एक नाव तक नहीं, कोई खोज-खबड़ नहीं। ज़रूरत क्या है उसकी। हेलीकॉप्टर से सड़े हुए पाव-रोटी पानी में छपाक से गिरा देने भर से ही उनके कर्तव्यों की इति श्री हो जाती है। बाकी का काम अखबारवाले कर देते हैं-काफी राहत सामग्री बाँटी गई। सब ठीक है।"20

यह सच्चाई है कि बाढ़ में मनुष्यों की स्थिती जानवरों से भी ज़्यादा ख़राब हो जाती है। जानवरों को भी लोग खाना सामने ले जा कर देते हैं लेकिन बाढ़ में मनुष्य को खाना हेलीकॉप्टर से गिराकर दिया जाता है। बहुत बार तो लोग खाना लूटने के चक्कर में आपस में ही लड़ने लगते हैं। कोसी क्षेत्र के नेताओं को भी वहाँ की जनता से कोई सरोकार नहीं है। वे दिल्ली में ऐशो आराम से रहते हैं। 

सबेरा होने पर मदद आती है तो दोनों तटबंध (सुरक्षित स्थान) पर पहुँचते हैं। देवी माँ अच्छे परिवार का होकर भी गाँव के लोगों के कष्टों का ध्यान रखती हैं। उनके भीतर मानवीयता की सच्ची संवेदना है। वे चाहती तो अपने बच्चों के साथ शहर में रह सकती थी लेकिन वे गाँव में अकेली रहना पसंद करती हैं। सवेरे उसपार जाने पर रातभर जगे होने के कारण चाय पीकर देवी माँ सोने की इच्छा ज़ाहिर करती हैं। 

यह कहानी बाढ़ में शुरू होती है और बाढ़ में ही ख़त्म हो जाती है। कहानी बहुत ही संवेदनात्मक है। कहानी में नेताओं को भले अपनी जनता से लगाव न होता है लेकिन बाढ़ में फँसे लोग एक दूसरे की मदद ज़रूर करते हैं। जीवन सहयोग करने और सहयोग लेने का ही नाम है। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी स्नेह और प्रेम के सहारे जीवन चलता रहता है। यह कहानी बिहार के तराई क्षेत्र की असलियत बयां करती है। 

"मरनै धार" भी बाढ़ की विभीषिका पर आधारित कहानी है। मुसहर जात की 'सुखड़ा बहू' को एक बेटी और तीन लड़के थे। बेटी का का नाम 'घुटरी' था। जिसे गाँव की बड़की भौजी (उच्च और संपन्न जाति की औरत) ने बदलकर 'नैना' कर दिया था। जब सुखड़ा बहू काम पर जाती तो बेटी को बड़की बहू के दरवाज़े पर छोड़ जाती और 'नैना' सुबह से शाम तक वहीं रहती और रात को अपने घर जाती। 'नैना' के दोनों पाँव बचपन में काम नहीं करते थे। शरीर से वह स्वस्थ थी। उम्र के साथ-साथ वह एक पैर से चल-फिर लेती थी और अपना कार्य कर लेती थी। बड़की भौजी के यहाँ रहकर खाना बनाने के साथ-साथ सुई-बटन का काम भी सीख गई थी। एक दिन पूरा मुसहर टोला गाँव छोड़कर चला जाता है। 'नैना' की माँ उसे रात में दूध के साथ कुछ जड़ी-बूटी डाल कर पिलाती है। सबेरे नैना के भाई-पिता और माँ चुपचाप निकल जाते हैं और 'नैना' को बोझ समझकर छोड़ जाते हैं। बड़की भौजी को जब ख़बर का पता लगता है तो वह उसे अपने घर ले जाती हैं। ले जाते समय वह करती हैं, "नैना, सारा मुसहरी साफ, तुम चलो मेरे साथ।"21

मुसहरी टोला लछमिनिया के पास जाकर बस जाती है। बाढ़ आने पर बड़की भौजी की सास रेडियो पर ख़बर सुनती है, "कोसी अपनी साबिक धारा में हहराती हुई दाखिल हो गई।"22 लछमिनिया मुसहरी भी इस बाढ़ में विलीन हो जाती है और 'नैना' के माता-पिता और भाई भी। 'नैना' भौजी के पास आती है और उनके घुटनों पर सिर टेक देती है, "उसकी बड़ी-बड़ी आँखों से दरियाव फूट पड़ा। सबने देखा कभी न रोने वाली ये सूखी मरनै-धारा सी आँखे दरियाव हो गईं।"23

यह कहानी छोटी लेकिन बहुत ही मारक है। जिस बच्ची को उसके माता-पिता उसे बोझ समझकर छोड़ जाते हैं, उन्हें शायद जीने का अधिकार भी नहीं था। इसलिए शायद प्रकृति भी उनसे बदला लेती है। जिस बच्ची को ढाढ़स बँधाना था। जिस अभिभावक को उस बच्ची के साथ सबसे ज़्यादा समय बिताना था वही उसका साथ छोड़ देते हैं ! अपने कर्तव्य को पूरा नहीं करते हैं! ऐसे अभिभावक को अभिभावक होने का कोई अधिकार ही नहीं है। 

'नटयोगी' कहानी नट समुदाय के बच्चों पर आधारित है। इस कहानी में बच्चे के माँ-बाप रुपये की कमी के कारण एक व्यवसायी के पास अपने लाडलों को काम करने के लिए छोड़ देते हैं। वह इन सुन्दर बच्चों को सजा-धजा कर शादियों में खड़ा करवाता है। बच्चों को जब मच्छर काटते हैं तब हिलने पर शादी में आये अन्य बच्चे उसे समझ जाते हैं कि यह मूरत नहीं बल्कि इंसान है। वे बच्चे, "दोनों के पैरों में पिन चुभोकर देखने लगे। बिट्टू और संजू दर्द पीकर खड़े रहे।"24 बच्चे जब अपनी माँ से यह बताते हैं तो माँ का हृदय पिघल जाता है और वह अगले दिन बच्चों को नहीं जाने देना चाहती है। पिता को डाँटते हुए वह कहती है, "अब तुमको हरा-हरा लमड़ी (सौ का नोट) दिखाई देता है। हम हलाल होने जाने दें?"25 लेकिन पिता द्वारा यह आश्वासन मिलने के बाद वह बच्चों को फिर भेजती है। पूरे लगन में बच्चे इसी तरह रोज़ जाते रहते हैं। पाँव के घाव पूरे महीने में पक जाते हैं। उस सीज़न के लगन का अन्तिम दिन, "लँगड़ाते हुए उठे दोनों तैयार होने के लिए। अम्माँ के चेहरे पर क्षण भर के लिए पीड़ा उभरी, फिर ग़ायब हो गई। पीड़ा का स्थान संतोष ने ले लिया। पिता उमंग से लबरेज़ था, बेटो ने योग साध लिया है, अब दुख दूर हुए।"26

इस कहानी में माँ-बाप की मजबूरी को दिखाया गया है जो बच्चों को पढ़ाना तो चाहते हैं लेकिन आर्थिक स्थिति से संपन्न न होने के कारण कुछ रुपयों के ख़ातिर काम करने के लिए भेजते हैं। बच्चे ग़रीब परिवार में जन्म लेने के कारण बाल मज़दूरी करने को अभिशप्त हैं और अभिभावक ना चाहते हुए भी मज़दूरी करवाने को अभिशप्त हैं। यह कहानी संवेदनात्मक स्तर पर बहुत ही उच्च कोटि की कहानी है। कहानीकार उषाकिरण खान ने बच्चों के साथ-साथ अभिभावक की सम्वेदना को बहुत ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है। इस कहानी के सम्बन्ध में गोपाल राय का भी मानना है कि, "यह पीड़ा ममता और पैसा कमाने की लाचारी मिलकर पाठक की सम्वेदना को झकझोड़ने में समर्थ है।"27

'यंत्रव्याघ्र का जबड़ा' एक ऐसी कहानी है जो तकनीकी विषय पर लिखी गई है। आज मनुष्य तकनीक का उपयोग ज़्यादा कर रहा है लेकिन इसके साथ-साथ तकनीक का गुलाम ही बन रहा है। इस कहानी में दिखाया गया है कि एक सीमा नाम की औरत नई चेक बुक लेने और पासबुक अपडेट कराने बैंक जाती है। उसे पता चलता है कि, "चार दिनों से लिंक फेल है, सारा काम ठप है।"28 जो लोग रुपया निकालने आए थे उनका रुपया नहीं निकल पा रहा है। लोग परेशान हैं। अगले दिन भी बैंक का लिंक नहीं आता है। अलग-अलग लोगों की अलग-अलग दिक़्क़तें हैं। एक व्यक्ति को रुपये की तत्काल ज़रूरत है। वह कहता है, "मैं क्या करूँ? मेरा सब कुछ लुट जाएगा। मेरी वाइफ के पेट में बच्चा रह जाएगा। बिना पैसे के कुछ न होगा।"29 भीड़ उत्तेजित हो जाती है। लोग 'मैनेजर' का 'कॉलर' पकड़ लेते हैं। 'मैनेजर' लोगों से विनय करते हुए मुख्यालय बैंक से बात करता है। मुख्यालय बैंक नज़दीक होने के कारण 'मैनेजर' उस व्यक्ति को साथ ले जाता है और वहाँ से रुपए दिलवाता है। 

मशीन और तकनीक हमें किस तरह पंगु बना देती है उसका उदाहरण है यह कहानी। मशीन का उपयोग हमें करना चाहिए लेकिन उस पर निर्भरता क़ायम नहीं रखनी चाहिए क्योंकि ज़रूरत पड़ने पर हमें मशीन छोड़कर भी काम करने की आदत होनी चाहिए क्योंकि ज़्यादा मशीनों के उपयोग के कारण मनुष्य ही मशीन होता जा रहा है। मशीनों के लगातार उपयोग के कारण मनुष्य की सम्वेदनशीलता में कमी आयी है। हमें तकनीक, मशीन और आधुनिकता को एक सीमा तक ही अपनाना चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि यह सभी चीज़ें हमें संवेदनात्मक स्तर पर कमजोर कर हमारी जड़ों से दूर कर दे। 

'जवाहरलाल' एक ऐसे मेहनतकश रिक्शेवाले की कहानी है जो 'हंसा' नामक मेम साहब के कहने पर बेटे-बेटियों को स्कूल में पढ़ाता है। एक रिक्शा से छः रिक्शा खरीद लेता है और दूसरों को भाड़े पर रिक्शा चलाने देता है। बहनोई के मर जाने के बाद उसे दुख होता है लेकिन टूटता नहीं है। वह बुढ़ापे में भी रिक्शा चलाता है जिससे बाद में बिना बच्चों के सामने हाथ फैलाए अच्छा जीवन स्वाभिमान के साथ जी सकें। वह शहर में अपनी कमाई से एक घर भी बनाना चाहता है। कहानीकार कहानी की अंतिम पंक्तियों में करती हैं, "नहीं मानेगा यह जवाहरलाल। उन्होंने देश के निर्माण के सपने देखे, इस ग्रामीण विपन्न ने अपने घर के निर्माण के सपनों को साकार करने का बीड़ा उठाया है।"30 जवाहरलाल अपने नाम को सार्थक करना चाहता है। कहानी के सम्बन्ध में गोपाल राय ने ठीक ही कहा है, "जवाहर लाल एक कर्मठ रिक्शा वाले के श्रम, संतोष और आत्मविश्वास की कहानी है। वह अपने नाम को इस अर्थ में सार्थक करना चाहता है कि उसे किसी के सामने हाथ न पसारना पड़े और वृद्ध होने पर सुख-संतोष का जीवन बिता सके।"31 यह कहानी निम्न वर्गीय व्यक्ति के कर्मठता की कहानी है जो विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानता है। 

'मोती बे-आब' साहित्यिक जगत की विडम्बनाओं पर लिखी कहानी है। इस कहानी में बेटे के बुरे बर्ताव के कारण कवि की स्मृति चली जाती है। बेटा और बहू भी शिखर सम्मान पुरस्कार लेने के दिन प्रोग्राम में शामिल होते हैं। बेटा अपनी बहन को सहेलियों के साथ घर में पार्टी करने के कारण घर से निकाल देता है जो कॉलेज में प्रोफेसर थी और अपने पिता की किताबों को ठीक से सहेज कर रखती थी। उसके कमरे को भी बेटा भाड़े पर लगा देता है। पुरस्कार के वक़्त बेटा और बहू मंच पर पहुँच जाते हैं। कहानीकार उषाकिरण खान लिखती हैं, "चेक और प्रशस्ति-पत्र संभाल लेने वाले हाथ पहचाने से थे। अब मम्मी-पापा आ गए थे। दोनों ओर से उन्होंने थाम रखा था दादाजी को।"32

यहाँ कहानीकार उषाकिरण खान ने कहानी में आज के बच्चों के दोहरे चरित्र को दुनिया के सामने उजागर किया हैं। जिस बेटे के क्रूर व्यवहार के कारण कवि की स्मृति चली जाती है वह दुनिया के सामने दिखला रहा है कि वह अपने पिता का बहुत ही ज़्यादा ध्यान रखता है और वह एक आदर्श पुत्र है। 

इस कहानी में यह दिखाया गया है कि एक कवि जिस 'ऑफ़िस' में ज़िन्दगी भर काम करता है वहाँ के लोग उसे 'नोटिस' नहीं करते हैं और घर में बेटा उसकी क़द्र नहीं करता है। कवि की स्मृति तक बेटे के क्रूर व्यवहार के कारण चली जाती है। लेखक संस्थान भी उसपर तब ध्यान देते हैं जब कवि की स्मृति चली जाती है। शिखर सम्मान की घोषणा होते ही पूरा शहर कवि की क़द्र करने लगता है। बेटा भी पिता के साथ फोटो खिंचवाने मंच पर तुरंत पहुँच जाता है। वह दुनिया के सामने दिखलाता है कि वह अपने पिता का बहुत ही ज़्यादा हितैषी है। लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि लेखक को तब पुरस्कार और सम्मान मिल रहा है जब वह पुरस्कार और सम्मान का मतलब भूल चुका है। घर के लोग क़द्र तब कर रहे हैं जब वह क़द्र को समझ नहीं सकता। ऐसा बहुत बार साहित्य में होता है कि समय पर लेखन संस्थाएँ और सरकार लेखक को पुरस्कार नहीं देती है। जब पुरस्कार देती है तब तक लेखक का क़द या तो पुरस्कार से बड़ा हो जाता है या पुरस्कार का कोई मतलब उसके लिए नहीं रहता। इस दृष्टिकोण से यह कहानी साहित्य जगत की सच्चाई को उजागर करती है। 

उषाकिरण खान अपनी कहानियों में नैरेटर के रूप में जगह-जगह मौजूद रहती हैं। उनकी कहानियों में नैरेटर और पात्रों के सम्वाद में अनूठा सामंजस्य देखने को मिलता है। ऐसा करने से कहानी पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ रहती है। कहानी के भीतर सम्वेदना पिरोने में उन्हें महारत हासिल है। सम्वेदना के स्तर पर उनकी कहानियाँ बहुत ही समृद्ध हैं। 

उषाकिरण खान की कहानियों की भाषा-प्रवाह देखन लायक़ है। उत्तरी बिहार के कोसी अंचल की ठेठ ग्रामीण शब्दावलियों और लोकोक्तियों का प्रयोग इनकी कहानियों में जगह-जगह देखने को मिलता है। ठेठ ग्रामीण शब्दावली और लोकोक्तियाँ इनकी भाषा की प्रवाहमयता को बढ़ाती है जिससे कहानियाँ मारक और सम्वेदनापूर्ण हो जाती है। प्रेमचंद की कहानियों की संवेदना और फणीश्वरनाथ रेणु के कहानियों की आंचलिकता उषाकिरण खान की कहानियों में एक साथ देखने को मिलती है। अतः यह कहना उचित होगा कि प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु की मिट्टी से जो मूरत तैयार होती है वह उषाकिरण खान है। 

सन्दर्भ:

1.उषाकिरण खान, उषाकिरण खान संकलित कहानियाँ, भारतीय पुस्तक न्यास भारत (नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया), ISBN 978-81-237-7118-2, पहला संस्करण : 2014, पहली आवृत्ति : 2017, नेहरू भवन, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज़-II, वसंत कुंज, नई दिल्ली-110070 द्वारा प्रकाशित। पृष्ठ - 7.(भूमिका से) www.nbtindia.gov.in
2. वही, पृष्ठ-55.
3. वही, पृष्ठ-55.
4. वही, पृष्ठ-55 और 56.
5. वही, पृष्ठ-58.
6. वही, पृष्ठ-58.
7. वही, पृष्ठ-58.
8. वही, पृष्ठ-58.
9. वही, पृष्ठ-59.
10. वही, पृष्ठ-59.
11. वही, पृष्ठ-59.
12. वही, पृष्ठ-59.
13. वही, पृष्ठ-59.
14. वही, पृष्ठ-02.
15. वही, पृष्ठ-02.
16. वही, पृष्ठ-05.
17. वही, पृष्ठ-44.
18. वही, पृष्ठ-44.
19. वही, पृष्ठ-45.
20. वही, पृष्ठ-130.
21.उषाकिरण खान, उषाकिरण खान की लोकप्रिय कहानियाँ, ISBN 978-93-5186-283-3, प्रकाशक-प्रभात प्रकाशन, पता-4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली-110002, संस्करण - प्रथम, 2015, मुद्रक - आर-टेक ऑफसेट प्रिंटर्स, दिल्ली। पृष्ठ - 91.
22. वही, पृष्ठ-92.
23. वही, पृष्ठ-92.
24.उषाकिरण खान, उषाकिरण खान संकलित कहानियाँ, भारतीय पुस्तक न्यास भारत (नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया), ISBN 978-81-237-7118-2, पहला संस्करण : 2014, पहली आवृत्ति : 2017, नेहरू भवन, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज़-II, वसंत कुंज, नई दिल्ली-110070 द्वारा प्रकाशित। पृष्ठ - 9.
25. वही, पृष्ठ-11.
26. वही, पृष्ठ-12.
27. वही, पृष्ठ-11. (भूमिका से)
28.उषाकिरण खान, उषाकिरण खान की लोकप्रिय कहानियाँ, ISBN 978-93-5186-283-3, प्रकाशक-प्रभात प्रकाशन, पता-4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली-110002, संस्करण - प्रथम, 2015, मुद्रक - आर-टेक ऑफसेट प्रिंटर्स, दिल्ली। पृष्ठ -51.
29. वही, पृष्ठ-53.
30. वही, पृष्ठ-31.
31. वही, पृष्ठ-11.(भूमिका से)
32. वही, पृष्ठ-27.

कुमार सुशान्त
पता-17/2 रजनी कुमार सेन लेन,
तल - द्वितीय, फ्लैट नंबर - 203,
पोस्ट ऑफिस - हावड़ा, जिला - हावड़ा,
राज्य - पश्चिम बंगाल,
पिन कोड -711101.

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