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स्रष्टा

मैं अँधेरों में जी रहा था
और तुम
मुट्ठी भर प्रकाश ले आई
हमने उसे सूर्य बना लिया

हमने सपनों के महल
सजाए –
तो आकाश..
बनता चला गया

प्रेम मेह बन बरसा
तो धरती बनी –
ताकि
फूल खिल सकें
रंग बिखराते, सुरभि फैलाते

अभी दो गाम भी न चले थे
पर एक-
सफ़र तय हो गया
अब लौट के देखता हूँ

तो
एक डगर खड़ी है
हमारे पदचिह्न समेटती हुई
लगता है कि –
तुम और मैं ही तो स्रष्टा हैं!

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