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शामों का क्या!!

अक़्सर ढल जाती हैं शामें!
इरादतन, मैंने हज़ार कोशिशें की ,
‛शाम को’ अपने बाजुओं में छिपाने की।
लेकिन जैसे फिसल जाता है वक़्त,
ज़िंदगी की दरारों से,
जैसे फिसल जाती है रेत,
उँगलियों के पोरों से।
ठीक ऐसे ही, फिसल जाती हैं शामें,
पश्चिम के किनारों से।
और मैं, निरखता, सोचता हूँ।
सूरज की ललाई को,
पश्मीने की तरह ओढ़ता हूँ,
महसूस करता हूँ 
किसी अज्ञात प्रेम को
अपनी ओर आते हुए,
और फिर उसको, मुझमें मिल जाते हुए।
इस तरह कुछ पल ही सही,
बिठा लेता हूँ शामों को बाजू में,
फिर थकी और अलसाई किरणें
फिर पुनर्नवा हो कर आने के लिए रोज़,
विदा माँगती हैं, मेरे अस्तित्व से, लौट जाते हुए।

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