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शब्दों का आईना

तारीखों से पुराने हो जाते हैं,
दिन, महीने, साल
लेकिन कुछ घाव नये ही रहते हैं।


जब भी उस गली से,
कुछ सोचता हुआ गुज़रता हूँ।
न जाने कितने ग़मों की सौगात लिए आता हूँ।


ख़ुशक़िस्मती से मिली थी वो,
दरख़्त की छाँव।
लेकिन बदक़िस्मती से मेरे,
जीवन की धूप गुज़र चुकी है।


बड़ी मुश्किल से चलाता हूँ,
अपने ज़िन्दगी का सौदा।
फटे-पुराने नोट की तरह,
मरोड़ कर चला ही लेता हूँ।


नाखूनों की तरह काट देता हूँ,
मैं अपनी औक़ात।
शायद दोनों का बढ़ना,
अच्छा नहीं होता।


जब भी देखता हूँ,
दीवार की घड़ी
आँखों में चुभ जाती हैं,
उसकी सुईयाँ
ज़िन्दगी का एक क़तरा बीताकर।


पगडंडियों से नहीं गुज़रती अब,
ठहरी हुई शाम,
शेष बचा कुछ ले जाने के लिए।
 

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