अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

शांति की आवाज़

किसी मनोहर बाग़ में एक दिन,
किसी मनोहर भिक्षुक गाँव,
लिए हाथ में पुष्प मनोहर,
बुद्ध आ बैठे पीपल छाँव।


सभा शांत थी, बाग़ शांत था,
चिड़ियाँ गीत सुनाती थीं।
भौरें रुन झुन नृत्य दिखाते,
और कलियाँ मुस्काती थीं।

 

बुद्ध की वाणी को सुनने को,
सारे तत्पर भिक्षुक थे,
हवा शांत थी, वृक्ष शांत सब,
इस अवसर को उत्सुक थे।


उत्सुक थे सारे वचनों को,
जब बुद्ध मुख से बोलेंगे,
बंद पड़े जो मानस पट है,
बुद्ध निज वचनों से खोलेंगे.


समय धार बहती जाती थी,
बुद्ध मुख से कुछ न कहते थे,
मन में क्षोभ विकट था सबको,
पर भिक्षुक जन सहते थे।


इधर दिवस बिता जाता था,
बुद्ध बैठे थे ठाने मौन,
ये कैसी लीला स्वामी की,
बुद्ध से आख़ि
र पूछे कौन ?


काया सबकी भाग में स्थित,
पर मन दौड़ लगाता था,
भय, चिंता के श्यामल बादल,
खींच खींच के लाता था.

तभी अचानक ज़ोर से सबने,
हँसने की आवाज़ सुनी,
अरे अकारण हँसता है क्यूँ,
ओ महाकश्यप, ओ गुणी।


गौतम ने हँसते नयनों से,
महाकश्यप को दान किया,
निज वन में जाने से पहले,
वो ही पुष्प प्रदान किया।


पर उसको न चिंता थी न,
हँसने को अवकाश दिया,
विस्मित थे सारे भिक्षुक क्या,
गौतम ने प्रकाश दिया।


तुम्हीं बताओ महागुणी ये,
कैसा गूढ़ विज्ञान है?
क्या तुम भी उपलब्ध ज्ञान को,
हो गए हो ये प्रमाण है?


कहा ठहाके मार मार के,
महाकश्यप गुणी सागर ने,
परम तत्व को कहके गौतम,
डाले कैसे मन गागर में।


शांति की आवाज़ सुन सको,
तब तुम भी सब डोलोगे,
बुद्ध तुममें भी बहना चाहे,
तुम सब मन पट कब खोलोगे? 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

किशोर साहित्य कहानी

कविता

हास्य-व्यंग्य कविता

नज़्म

कथा साहित्य

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं