अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

शरीर पार्थिव हो गया

शरीर पार्थिव हो गया।
शरीर पार्थिव हो गया।
अनगिनत अभियोग
आरोप
और न जाने क्या क्या
सब उस शरीर पर ही तो थे,
तन का ही अंकन
हुआ था
नाम से,
आत्मा को छुआ किसने?
बताते रहे संहिता
दंड के प्रकार
विधि के रचनाकार,
तर्क हुआ कहाँ इस विषय पर
कि कैसे
पवित्र आत्मा से
अनियंत्रित वो शरीर हुआ?
अंततः अधीर हुआ;
कदाचित दोषी था वो,
और तुम कितने निर्दोष!
कैसे
तैयार किये थे
तुमने
अभियोग के
प्रलेख,
श्रुतलेख
जो गढ़े गये,
कुछ आरोप जो मढ़े गये;
कदाचार
अत्याचार
से सहमा, वो मौन रहा
कहने को फिर कौन रहा?
भव्य!
निःसंदेह है तुम्हारी योग्यता,
सुविधा देख
साक्ष्यों को मरोड़ना
कड़ी से कड़ी जोड़ना
रिक्तता को भरना
न भरे तो, गढ़ना
तुम्हारे स्वांग
आडम्बर
प्रतिष्ठा
कर्तव्यनिष्ठा के सामने
वो कहाँ टिकता,
कितना बिकता
विधि के बाजार में;
धूर्त था,
जाते जाते
कपट कर
तीव्र लपट कर
ज्वाला, तुम्हारे अंतः की
अनंत में खो गया;
शरीर पार्थिव हो गया।
नश्वर तुम भी हो,
कदाचित
निर्बल
दुर्बल
होकर ही मिटोगे,
तुम्हारा
मान
अभिमान
अहं जब शीत होगा,
अग्र वर्तमान के अतीत होगा;
स्मारित होगी
अतिरेकता
कर्तव्य की 
अनुक्षेत्र की,
किन्तु भविष्य की शून्यता में
असहाय
प्रायश्चित बोध लिए,
प्रारब्ध गोद लिए;
अंतः की ज्वाला में जलते,
म्लान हो हाथ मलते;
अनसुलझे विषय
अपराध बोध
लिए
तुम भी चले जाओगे,
बेखटक इतिवृत्त दोहराओगे;
और
पुनः अनुगूँजते वही भाव,
हाँ वही भाव;
शरीर पार्थिव हो गया।
शरीर पार्थिव हो गया।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं