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शतंरज

सदियों से बिछी है चौपड़
वक़्त खेलता बाज़ियाँ
पिंजरे में बंद शेर की तरह
मानव करता कलाबाज़ियाँ
ज़ेहन मे चलते रहते युद्ध
फ़तह मिलेगी या ज़िल्लत
विलासी विषयासक्त सा जन
जीत की हर बार ले प्रण
भूल जाता है वो अक्सर
क्षितिज पर नहीं मिलते 
कभी अवनि और अंबर
जीत हार उलझन मन के
मोहरे हैं वो रखे चौसर पर
फिर भी खेले वो बाज़ी
मीर और मिरज़ा बनकर
चुपचाप सा गुज़रता जीवन
वो देखो 
वाजिदअलीशाह 
बेड़ियों मे बँधे 
गुज़र रहे हैं।

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