अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

शेष प्रसंग

आँगन में खाट पर लेटी अम्मा का दुर्बल शरीर दिनभर धूप सेंकने के बाद और खेस में लिपटे होने पर भी सर्द था। पिछले कुछ सालों से चुस्त, तन्दुरुस्त अम्मा को, एकाएक बुढ़ापे की कमजोरी ने ऐसा धर दबोचा था कि अब वह चौबीस घन्टे बिस्तर पर ही पड़ी रहती थी। नहाना धोना भी बड़ी मुश्किल से किसी तरह तोषी और किशनों की सहायता से हो पाता था। अम्मा तोषी का मुँह देखकर जी रही थी। बेटे तोषी की बहू घर में आने की आस में शायद अम्मा के प्राण अटके थे। बिस्तर पर पड़े-पड़े, हर पल भगवान से मनाती रहती कि - “काश! तोषी शादी के लिए तैयार हो जाए और उसकी देखभाल करने वाली, उसे रोटी देने वाली, उसका तन-मन से ख्याल रखने वाली, एक सुघड़, सलोनी बहू घर में आकर चार चाँद लगा दे।“

अम्मा के तीन बेटों में तोषी सबसे बड़ा था। जब वह 14 वर्ष का था, तभी उसके बाबू जी भगवान को प्यारे हो गए थे। उनके आकस्मिक निधन से तोषी का किशोर मन इतना आहत हुआ कि, वह कई महीनों तक गहन ख़ामोशी में डूबा रहा। न हँसना, न बोलना। तब से, जैसे दोनों छोटे भाईयों और माँ का ‘गार्जियन’ बन, दिन पर दिन, गम्भीर से गम्भीरतर होता गया। मानो वह इन तीनों के लिए ही जीता था। स्वयं के लिए, उसका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं था। उनका भविष्य, सुख-दुख, पसन्द-नापसन्द, यह सोचना, ख्याल रखना ही उसका जीवन बन चुका था। माँ की अधिक से अधिक सेवा करना, हर तरह से उसके कामों में हाथ बँटाना, उसे चिन्ता मुक्त रखना, ये सब उसकी दिनचर्या में शामिल था। तब से जो तोषी ने बुजुर्गियत ओढ़ी तो वह आज तक ऐसी बरकरार है कि शादी का जक्र आते ही वह स्वयं को विवाह के लिए बड़ा बुजुर्ग मानने लगा है।

बी.एस-सी. प्रथम श्रेणी में पास करने पर भी तोषी ने आगे पढ़ने का विचार छोड़कर, एक इंटर कॉलिज में नौकरी कर ली थी। अपनी थोड़ी सी तनख्वाह में वह बड़ी समझदारी से घर का खर्च, भाईयों के कपड़े, किताबें आदि सभी जरुरतों को समेटता था। दोनों छोटे भाई, उसके भाई कम, बेटे अधिक थे !

तोषी दिखने में कम आकर्षक न था। सुडौल चेहरे पर बड़ी-बड़ी आँखें, देखने वाले को सहसा ही अपनी ओर खींचती थीं। लम्बा कद, घने घुँघराले बाल, भावुक व्यक्तित्व - कुल मिलाकर, पड़ौस की करुणा का दिल चुराने  के लिए, ये सब जरुरत से ज्यादा था। तोषी भी किशोरावस्था के सहज-स्वभाविक प्रभाव से अछूता न था। उसे भी करुणा ‘अच्छी’ लगती थी। उसकी उपस्थिति से जैसे तोषी का सब कुछ सज-सँवर जाता था। बल्कि यों कहा जाए कि - वह उसे मन की मन चाहता था - तो गलत न होगा। पर अपनी ‘चाहत’ से अधिक, उस पर भाईयों का प्यार, उन्हें पालपोस कर सैटिल करने का इरादा अधिक हावी था। सो उसने करुणा के लिए अपनी चाहत को, अपनी भावनाओं को अधिक हवा नहीं दी और उन्हें मन में सँजोकर कर जन्दगी जीता रहा। चुप-चुप, खामोश! करुणा भी उसके प्रेम में अन्दर ही अन्दर पगी रही। देखते ही देखते वह दिन भी आ गया जब वह मूक आँखों से टप-टप आँसू गिराती दुल्हिन बनकर विदा हो गई। तब तोषी ने स्वयं को बड़ा खाली-खाली महसूस किया। करुणा के विदा होने पर, वह अपने कमरे में बंद होकर, घन्टो सूनी छत को ताकता रहा था और फिर एकाएक फफक कर रो पड़ा और न जाने कब तक आँसू बहाता रहा था। प्रेम को पीड़ा बनाने वाला वह स्वयं ही था - करुणा का अपराधी, अपनी खुशियों का दुश्मन! उसे किसी से गिला शिकवा नहीं था - उसका ही तो सब करा धरा था - फिर रोना कैसा, दर्द कैसा? लेकिन कुछ चीजे सदियों से साथ-साथ चलती आई हैं, जिनमें प्यार और पीड़ा के ‘साथ’ में आज तक कभी दरार नहीं पड़ी। तोषी के जीवन से प्यार तो विदा हो गया था लेकिन जाते-जाते ‘पीड़ा’ उसे भेंट में दे गया था...! ऐसे मूक प्रेम की पीड़ा जितनी असहाय होती है, उतनी ही असहनीय भी! न उसे किसी के साथ बाँटा जा सकता है, न उसे शब्द लिए जा सकते है - बस ‘मौन’  ही उसकी नियति होती है।

धीरे-धीरे दिन पखेरु की तरह उड़ते चले गए। सामने मनचाहा उद्देश्य  होने पर भी, उसमें जुटे रहने पर भी, तोषी अक्सर उदास रहता। आखिर वह भी तो एक इंसान ही था- इस पर अतिभावुक और सम्वेदनशील ! करुणा से उसके भावनात्मक लगाव पर उसका नियंत्रण नहीं था। एक लम्बा अरसा बीत जाने पर भी, करुणा की याद उसके दिल में ज्यों की त्यों बनी रही। दिल के रिश्ते, भावनाओं से जुड़े संबंध यदि शादी ब्याह की रस्मों से दफन हो जाया करते तो जीवन बड़ा आसान हो जाता जीवन की उलझनें सुलझ जाती! समय और उम्र के साथ तोषी की चाहत, उसकी कर्त्तव्यपरायणता के साथ घुलमिल गई और वह बढ़ते, पढ़ते भाईयों को देख-देख कर, अपने लक्ष्य की ओर जोश से बढ़ने लगा।

जब शेखर ने इन्जीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास की और वह उसके लिए चुना गया तो, तोषी की खुशी नवे आसमान पर थी। वह मिठाई लेकर सीधा माँ के पास पहुँचा और बोला -

“लो अम्मा, भोग लगाओ“, उनके मुँह में पेड़ा ठूँसते हुए, शेखर और दिवाकर को आवाज देने लगा। माँ बोली - “अरे मन्दिर में भी मीठा चढा आया कि नहीं?“

तो वह मस्त कलंदर की तरह चिहुँका - “अरे छोड़ो भी अम्मा, मेरे लिए तो, मेरा यह घर, आँगन ही मन्दिर है और तुम मेरी भगवान हो। तभी तो सबसे पहले तुम्हें भोग लगाया है।“

माँ यह सुनकर प्यार से आँखें तरेरती, रसोईघर में जाकर, तोषी के प्यार से और शेखर के पास होने की खुशी में छलछलाई आँखे पोंछने लगी थी।

*

कुछ वर्ष बाद छोटे भाई दिवाकर के बी.ए. कर लेने पर, तोषी, सुविचारित ध्येय के अनुसार, उसे मर्चेन्ट नैवी की प्रवेश परीक्षा दिलाने मुम्बई गया। छोटे शहर का सीधा-सादा युवक, बड़े शहर की - वह भी मुम्बई जैसी मायानगरी की तड़क भड़क, उलझे यातायात, गगनचुम्बी इमारतों, भीड़ भरी सड़कों, और आँखों से मिनटों में इंसान का एक्सरे कर लेने वाली शैतान आत्माओं से अनजान था। यह उसके जीवन का पहला अवसर था, जब वह छोटे भाई को लेकर मुम्बई गया था। राजधानी एक्सप्रैस से - कंधे पर बैग टाँगे, प्लेटफार्म पर उतरते ही, दोनों भाई सटे-सटे चलते, यात्रियों और कुलियों के धक्के, झटके खाते किसी तरह रेलवे स्टेशन के बाहर पहुँचे, तो टैक्सी वालों ने ललकार लगा-लगा कर, अपनी-अपनी टैक्सी में उन दोनों को ले जाने के लिए घेराबन्दी सी करके, तोषी का दिमाग लगभग खाली ही कर दिया। उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि कहाँ से ‘सिटी बस’ पकड़े। तभी किसी सज्जन ने उसकी मदद की और  वह ‘बेस्ट’ की बस में चढ़कर, धम्म से सीट पर बैठकर, दिवाकर को अपने पास खींचता सा समेटकर, कुछ निश्चिन्त हुआ। पर यह चैन, आराम भी थोड़े ही पल का था। उसे जहाँ उतरना था, वह जगह कहीं निकल न जाए; सो कन्डक्टर की स्थान संबंधी घोषणा को वह हर बार बड़े ध्यान से सुनता। इन्तजार करते-करते उसका ‘स्टॉप’ भी आ ही गया। दोनों भाई उतरे और परीक्षा स्थल पर जाकर सारी औपचारिकताएँ पूरी की। फिर पास ही एक कैन्टीन में हाथ मुँह धोकर कुछ खाया पिया। देखते ही देखते समय बीत गया और दिवाकर के परीक्षा हॉल में जाने की घड़ी आ गई। तोषी जब दिवाकर के साथ परीक्षा हॉल तक गया, तो वहाँ अचानक, उसे अपने एक पुराने सहपाठी का छोटा भाई दिखा। वह भी तोषी को देखते ही पहचान गया। एक परिचित को एकाएक उस अनजान शहर में पाकर दोनों भाईयों का कुछ हौसला बुलन्द हुआ। सहपाठी का भाई बोला -

“भाईसाहब परीक्षा के बाद आप दोनों को मेरे साथ घर चलना होगा। घर पास ही हैं।“

तोषी को अजित का बड़ा सहारा सा महसूस हुआ। उसने सोचा, इतनी दूर मुम्बई आया है तो छोटी बुआ से मिल आना चाहिए। 10-15 साल हो गए। बुआ जी को भी सुखद आश्चर्य मिलेगा। यह सोचकर उसने अजित से कहा कि परीक्षा के बाद वह दिवाकर को अपने घर ले जाए और वह स्वयं भी  बुआ जी से मिलकर, जल्द से जल्द उसके घर पहुँच जाएगा। बुआ जी के घर के लिए, समय से निकलना भी जरुरी था। बस स्टॉप पर आकर वह ‘घाटकोपर’ जाने वाली बस के नम्बर की खोज बीन करने लगा। यद्यपि कुछ इलाकों में जाने वाली बसों के नम्बर ‘स्टॉप’ पर लिखे हुए थे, किन्तु घाटकोपर का नाम उस सूची में नहीं था। किसी से पूछना भी उसे उचित नहीं लग रहा था। मन के भय उसे ऐसा करने से रोक रहे थे, लेकिन दूसरे की मदद के अतिरिक्त, अब कुछ और उपाय भी उसे नजर नहीं आ रहा था। अतः उसने एक व्यक्ति से हिचकिचाते हुए धीरे से पूछा, तो वह तपाक से बोला -

“मैं भी घाटकोपर ही जा रहा हूँ, आप मेरे साथ ही उस बस में चढ़िए, जिसमें मैं चढूँगा।“

तोषी को सराहा सा मिला। थोड़ी देर में बस आई और वह उसमें, उस अनजान मार्गदर्शक के साथ सवार हो गया। रास्ते भर, वह व्यक्ति तोषी से तरह-तरह के सवाल करता रहा और सारी जानकारी बड़े प्यार और होशियारी से हासिल करके, उसने तोषी को उसकी बुआ के घर तक छोड़ने का बीड़ा उठा लिया। काफी देर हो चुकी थी। तोषी मन ही मन बेचैन था कि इतनी देर बुआ जी के घर तक पहुँचने में लग रही है, उसे वापिस दिवाकर के पास भी पहुँचना है। तब ही वह मीठा, चतुर रहनुमा तोषी से बोला -

“उठो, अब हमें यहाँ उतरना होगा।“ तोषी और वह झटपट उतरे और उस व्यक्ति ने एक टैक्सी रोकी, तोषी बोला -

“देखिए, मैं टैक्सी का किराया नहीं दे सकूँगा। मैं पैदल चलने को तैयार हूँ। यहाँ से कितनी दूर चलना होगा?“

वह शातिर आदमी तोषी के कंधे को प्यार से थपथपाते हुए बोला -

“अरे प्यारे, तुमसे टैक्सी का भाड़ा माँगता कौन है? तुम इस शहर में अपुन का मेहमान हो, चिन्ता नई करने का, अपुन देगा भाड़ा।“

बेचारा तोषी मन ही मन उस अजनबी की उदारता से कृतज्ञ सा हुआ, सोच में डूबा, टैक्सी में बैठ गया। कुछ देर बाद टैक्सी एक अजीब से इलाके में पहुँच, गली दर गली गुजरती आगे बढ़ती गई। जिधर भी तोषी की नजर जाती, उसे साज-श्रृंगार करे युवतियाँ ही दिखाई पड़ती। उसका माथा ठनका। उससे रहा नहीं गया, अचकचाकर उसने पूछ ही लिया -

“यह कौन सी  जगह है?“

अजनबी टेढ़ी मुस्कान के साथ शरारती नजर तोषी पर डालता हुआ बोला - “इसे भिन्डी बाजार कहते हैं।“

तोषी अचरज से बोला - ‘भिन्डी बाजार ?’

नाम सुनकर, थोड़ा यह सोचकर वह सहज हुआ कि यह बड़ा सब्जी मार्केट है - लेकिन एक  ही सब्जी ‘भिन्डी’ के  नाम पर इसका नाम क्यों रखा गया - या  यहाँ भिन्डी बहुत अच्छी किस्म की मिलती है? लेकिन सब्जी के ढेर, टोकरे वगैरा तो कहीं दिखाई नहीं दे रहे - दूर-दूर तक। उसके प्रश्नचिन्ह बने चेहरे को ताड़कर, वह अजनबी शैतान उस पर ठहठहा कर हँस पड़ा। तोषी पुनः विचलित हुआ। कुछ सिमट कर, मानो अपने आप में  दुबक सा गया। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। अब उसे समझते देर नहीं लगी कि आज वह गलत फँस गया। सीधे सरल मन, सीधी सरल सोच वाले तोषी ने खामोश रहना ही ठीक समझा। तभी एक झटके से टैक्सी रुकी। भाड़ा चुकाकर वह अजनबी खट-खट सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ, उसे बड़े प्यार से एक घर में ले गया। तोषी का दिल एक अनजाने भय से बैठा जा रहा था। सजी-धजी बैठक में बैठते ही, कई जोड़ी आँखे पर्दे हटा-हटा कर इधर से, उधर से, उसे देखने लगीं। तोषी को लगा कि कहीं वह गश खाकर न गिर पड़े। किसी तरह उसने अपने को सम्हाला। जेब से रूमाल निकालकर चेहरे पर छलछला आए पसीने को पोछा। इतने में वह अजनबी ‘रहनुमा दोस्त’, जो अब तक उसकी नजर में ‘राहजन दुश्मन’ बन चुका था - “मैं अभी आया।-“ यह कहकर चला गया। एक अधेड़ उम्र की औरत और तोषी ही कमरे में रह गए थे। तभी उस औरत ने तोषी को उठने का इशारा किया और अपने साथ दूसरे कमरे में ले चली। वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ सा उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। दुर्जनों के हाथ पड़ने पर, सिर झुकाकर आज्ञा मानने में ही खैर थी। कमरे के अन्दर पैर रखते ही तीन किशोरियों ने बड़े प्रेम से उसका स्वागत किया। एक ने दरवाजे की सिटकनी चढ़ा कर, पर्दा खींच दिया। पास ही मेज पर रखे ट्रान्सजिस्टर पर बजता एक पुराना मधुर, सलोना गीत - “ये रात भीगी भीगी, ये मस्तफजाएँ, उठा धीरे-धीरे वो चाँद प्यारा प्यारा“ - वातावरण को मखमली और मादक बना रहा था। तोषी के पीले पड़े चेहरे को देख एक किशोरी की तो हँसी ही छूट गई। दूसरी को शायद उसकी बेचारगी पर दया आ रही थी, सो उसने उसे हाथ पकड़ कर हौले से कुर्सी पर बैठाया। तीसरी पास आकर, उसके माथे का पसीना पोंछकर, माथे पर अस्त व्यस्त पड़े बालों को पीछे कर प्यार से उसके बालों में अँगुलियाँ फिराने लगी। तोषी तो ऐसा निर्जीव हो गया - जैसे काटो तो खून नहीं। उसका गला ऐसा सूख गया कि थूक भी नहीं निगला जा सके। उन तीनों ने खिलखिलाकर बातें करके, उसे जितना ‘नार्मल’ करने की कोशिश की, उसकी हालत घबराहट के कारण उतनी ही बिगड़ती चली गई। अपनी घबराहट दूर करने के लिए तोषी ने, सब कुछ भूलकर अपना ध्यान उस गाने पर केन्द्रित किया और आँखें मूँद कर, उस गाने की मधुरता में खोता हुआ वहाँ के वातावरण से मानसिक रूप से दूर होने का प्रयास करने लगा। उन किशोरियों की तोषी को उत्तेजित करने की सारी कोशिश निष्फल होती जा रही थी। तोषी के सिर्फ हाथ पाँव ही ठण्डे नहीं थे, बल्कि सिर और सारा शरीर ही जैसे सुन्न हो गया था। उन युवतियों को लगा कि इस रूप के हाट में यह पंछी धे से लाया गया है। एकाएक उन कांगनाओं के मन में तोषी के लिए कोमल भावनाएँ जागने लगीं। वे उसके प्रति नारी सुलभ स्वेदना और सहानुभूति से भर उठीं। उनके पेशेवर हाव-भाव और कामुक भावनाएँ, तोषी के गुम होशहवास और बेचारगी से एकाएक वात्सल्यपूर्ण भावों में बदलने लगे। तीनों ने आँखों ही आँखों में तय किया और तोषी को 50 रुपये अपने पास से मदद के रूप में देकर छज्जे के पिछले दरवाजे से निकाल कर, गली में पहुँच कर, टैक्सी से फटाफट गायब हो जाने की सलाह दी। उस पेशेवर, भोग और विलास के इलाके की इस इंसानियत पर आश्चर्य से भरा, मन ही मन ईश्वर को लाख-लाख धन्यवाद देता, खैर मनाता, पिंजरे से आजाद पंछी की भाँति, तोषी लम्बे-लम्बे डग भरता, चलता गया और उस गली, उसके मोड़ के बिल्कुल पीछे छूट जाने पर ही, उसकी साँस में साँस आई। एकबारगी उसने पीछे मुड़कर, चारों ओर अच्छी तरह दृष्टि डालकर देखा कि कोई उसका पीछा तो नहीं कर रहा या कहीं वही चालबाज अजनबी तो कहीं उसके पीछे फिर से नहीं आ रहा? उसका दिल परेशान था, तरह-तरह के हैवानी ख्यालों की दशहत से फटा जा रहा था। उस इलाके से, उसकी हवा से तुरन्त दूर हो जाने की तीव्र इच्छा से उसने अगले बस स्टॉप तक के लिए टैक्सी कर ली। अजित का पता जेब में था। टैक्सीवाले  से दादर  तक  जाने वाली  बस  का  नम्बर  पूछकर  वह स्टॉप पर उतर गया। मन ही मन उसने तौबा कर ली थी कि वह अब इस मायानगरी में कभी किसी से अता-पता नहीं पूछेगा। शाम घिरने लगी थी। उसे दिवाकर की भी चिन्ता हो रही थी। सौभाग्य  से उसे बस की  अधिक देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। बस के आते ही वह फुर्ती से चढ़कर, आगे वाली सीट पर झपट कर बैठ गया, जिससे दादर आने पर, वह शीघ्रता से अगले दरवाजे से उतर कर दिवाकर के पास पहुँच जाए। उसकी मनोस्थिति अजीबोगरीब हो रही थी। वह एक बड़े खतरे, एक दुर्घटना से, सुरक्षित बचकर सही सलामत निकल आया था। उसके अन्तर्मन में लगातार चिन्तन, मनन चल रहा था कि अब आगे - इस शहर से अपने शहर पहुँचने तक क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए, दिवाकर के साथ कभी ऐसा न घटे; क्या कोई इंसान इतना घटिया और कुरूप भी हो सकता है कि बेवजह दूसरे इंसान को - ऐसी घिनौनी स्थिति में फँसा करा चलता बने? अपनत्व से भरे, अपने सीधे, सच्चे, भोले भाले शहर की छोटी सी दुनिया में पले बढ़े तोषी का ‘मेट्रो सिटी’ का पहला अनुभव बड़ा ही वितृष्णापूर्ण रहा। दादर आ चुका था। तोषी उतरा। उसकी नजर फुटपाथ पर बिकने वाले नगर की मार्गदर्शक पुस्तिका पर पड़ी। उसने बिना किसी देरी के एक पुस्तिका खरीद ली। काश! यह पुस्तिका उसे पहले मिल गयी होती, तो वह उस अजनबी के चंगुल में न फँसता। 7 बजते-बजते वह अजित के घर पहुँच गया। वर्षों बाद अजित की माँ से मिलकर तोषी खुश होने के साथ-साथ; अपने साथ ताजी घटी दुर्घटना के कारण कुछ अधिक ही भावविह्वल हो गया। अपने शहर के कम परिचित लोग भी, अचानक किसी अजनबी शहर में मिल जाने पर, कितने अपने लगते है - यह तोषी ने पहली बार जाना।


*

घर लौट आने पर, तोषी कई महीनों तक उस घटना को नहीं भूला। अपने नजदीकी हर व्यक्ति को उसने वह घटना सुनाई - महानगरी में सम्भावित  उस  तरह  के  हादसों  से  उन्हें सचेत करने के इरादे से, साथ ही अपने उस भयंकर अनुभव को औरों के साथ बाँट कर मन को हल्का करने की नीयत से भी।  खैर, उसके साथ जो घटा सो घटा पर, दिवाकर के साथ सबकुछ श्रेष्ठ घटा, क्योंकि वह परीक्षा में पास होकर ‘मर्चेन्ट नैवी’ में सलैक्ट हो गया था। दिवाकर ने तोषी के सपने को पूरा कर दिखाया था। तीनों भाईयों में सबसे छोटा, बेटे समान, दिवाकर तोषी की आशाओं पर खरा उतरा था। इस खुशी और उल्लास में तोषी अपने जीवन के उस तिक्त हादसे को काफी कुछ भूलने लगा था। तोषी अपने दिल की जरूरत से ज्यादा कोमलता और सम्वेदनशीलता से बहुत परेशान था, क्योंकि उसके कारण छोटी से छोटी, अच्छी और बुरी बात या घटना उसके दिलोदिमाग में लम्बे समय तक गड़ी रहती थी और वह चाहकर भी उससे पीछा नहीं छुड़ा पाता था। फिर भी उसने स्वयं को काफी बदलने का प्रयास किया, क्योंकि उसे लगा कि जीने के लिए ऐसा करना आवश्यक था। फिर भी, क्या व्यक्ति का मूल स्वभाव व जन्मजात आदतें बदल पाती हैं?

*

तोषी के जीवन का मूल मंत्र - उसके जीने का सहारा था - ‘संगीत’। लगभग प्रतिदिन उसके 4-5 संगीत प्रेमी मित्र बिना नागा शाम को घर आते; बाकायदा हारमोनियम, गिटार, बॉसुरी, बाँगो, काँगो, ढोलक व तबले के साथ रात 10.00 बजे तक उनका गाना बजाना चलता। माँ का भी मन लगा रहता। बीच में किशनो माँ को खाना भी खिला देती और मित्र मंडली को एक-एक कप चाय भी दे देती थी। संगीत गोष्ठी में बैठ जाने पर तोषी को खाने की भी जरूरत महसूस न होती। वह अक्सर कहता -

“खाना और गाना साथ-साथ नहीं हो सकते।“

उसका कहना भी ठीक था; क्योंकि भरे पेट गाना बड़ा कठिन होता है। दूसरे, जिसका ध्यान खाने में ही होगा, वह गायेगा क्या? गीत-संगीत तो एक ऐसी अनूठी और अनुपम कला है, जो व्यक्ति को सांसारिक उलझनों, तमाम झंझटों से दूर एक ऐसी सुख चैन से भरपूर उदात्त स्थिति में ले जाती है, जहाँ उसकी आत्मा तृप्त होती है। जब आत्मा तृप्त होती है तो शरीर की भूख-प्यास - सब उड़ जाती है; आत्मिक तल भरा होता है, तो शारीरिक तल पर भूख कहाँ रहती है? जब तक पूरी तरह व्यक्ति उस अनूठी दुनिया से, अपनी आम स्थिति में वापिस नहीं आता, तब तक शारीरिक ज़रूरतें उसे नहीं सताती। वह मानो एक साधक की भाँति अपूर्व सुकून और आनन्द की स्थिति में आकंठ डूबा होता है। तोषी इस मनोदशा में जीने वाला सच्चा संगीत प्रेमी था। शेखर और दिवाकर - दोनों ही अपने पिता समान भाई को बेहद प्यार करते थे। उसे दिल से भरपूर सम्मान देते थे। तोषी की रुचि से वाकिफ, दों भाईयों ने संगीत के लगभग सी साज उसे एक-एक करके भेंट कर डाले थे। दोनों छोटे भाई मात्र आर्थिक रूप से ही नहीं, अपितु भावनात्मक रूप से भी खूब सम्पन्न थे। तोषी ने उन दोनों की खातिर अपने कैरियर, अपनी तमाम इच्छाओं की जो कुर्बानी दी थी - उसका एहसास उन्हें सदैव बना रहता था।

तोषी के विवाह न करने का कारण था - उसके मन में बैठा यह भय कि - शादी के बाद कहीं वह अपने भाईयों के साथ अन्याय न कर बैठे; क्योंकि जब उसकी अपनी पत्नी होगी, बच्चे होंगे तो सम्भव है वह भाईयों को अपेक्षित ख्याल और प्यार न दे पाए। गृहस्थी के चक्रव्यूह में फँस कर छोटे भाईयों की ओर से कर्त्तव्यविमुख हो जाए। ऐसी ही बहुत सी बातें और प्रश्न उसके मन में घर किए हुए थे, जिनके कारण, उसने अविवाहित रहना ही श्रेयस्कर समझा। ‘वह अकेला है’ - इस बात का एहसास उसे तब होता, जब दूसरे उसे कह-कहकर इस अकेलेपन की याद दिलाते। वरना माँ, संगीत और काबिल छोटे भाईयों मे उसके लिए दुनिया की हर खुशी सिमटी हुई थी। वह बहुत सन्तुष्ट और सुखी था। कई बार वह अपने दोस्तों से, उनकी बात को हवा में उड़ाते हुए कहता - “अरे, धूल डालो शादी पर। मैं इस झमेले से बचा हुआ, मौज-मस्ती से रहता  हुआ क्या तुम्हें बुरा लगता  हूँ, खटकता हूँ? शादी नहीं की तो क्या हुआ; तुमसे कम सुखी नहीं हूँ।“ उसकी इस मस्त दलील का, उसके दोस्त ताली बजाकर और तबले की थाप देकर स्वागत करते तो, माँ भी हँसे बिना न रहती। रोज शाम को 4.00 बजे से 6.00 बजे तक तोषी कुछ बच्चों को गणित पढ़ाता, जिनमें दो बच्चे नौकरानी किशनो के होते दो-तीन बच्चे उन गरीब घरों से होते, जो उसके कॉलेज में पढ़ते थे और ट्यूशन फीस देने की क्षमता नहीं रखते थे, तथा एक दो, अपने मित्रजनों के बच्चें होते जो गणित के सवाल सही हल करने का गुरु मंत्र उस जैसे ज्ञानी और दिल से पढ़ाने वाले गुरु से सीखना चाहते थे। वर्तमान परिदृश्य में जहाँ समाज और आज का मानव जीवन, उपभोक्ता संस्कृति से बुरी तरह आवेष्टित है, हर कार्य, हर क्रिया, रिश्ते-बन्धन, सब ‘अर्थ’ आधारित हो गए है - मात्र धन के लोभ और स्वार्थ पर टिके है - ऐसे परिवेश में तोषी जैसा निस्वार्थ, रुपये पैसे के लोभ से दूर, जरूरतमन्द बच्चों को दिलोजान से पढ़ाने वाला, उनके भविष्य की खातिर, उनपर अपना समय, अपनी शक्ति खर्च करने वाला गुरु परम् सौभाग्य से ही मिलता है। बच्चे ही नहीं, बच्चों के माँ-बाप भी तोषी के प्रति बड़ा आदरभाव रखते कि बच्चे मात्र एक अच्छे व आदर्श अध्यापक से नहीं, अपितु एक सच्चे और खरे इंसान से सलीके से पढ़कर सही मार्ग दर्शन पा रहे हैं।  अपनी इस व्यवस्थित एवं स्थापित जीवनचर्या में तोषी सुखी और सन्तुष्ट नजर आता था। न जाने भगवान ने उसमें कितनी उदारता, कितनी सम्वेदनशीलता कूट-कूट कर भर दी थी!! क्योंकि वह हर अकेले, उपेक्षित और दुखी व्यक्ति का जरूरत के समय साथ देने वाला शहर का अकेला व्यक्ति था। वरना जहाँ व्यक्ति चाहकर भी, साथ न देने के दस कारण खोज लेते है, वहीं दूसरी ओर तोषी जरूरतमंद का  साथ  देने के लिए, अनेक  परेशानियों  और अड़चनों से घिरा  होने  पर भी, हमेशा कमर कस के तैयार रहता। ऐसा फक्कड़ साधु स्वभाव  था तोषी का।

कुछ  माह पहले गरीब ‘मास्टर सोहन’ की मौत की खबर मिलते ही, तोषी कोट पहन और मफलर गले में डाल, तड़के ही उनके घर पहुँच गया। बेचारे रात में सोते-सोते ही चल बसे थे। घर में टी.बी. की मरीज पत्नी के सिवाय कोई नहीं था। घर गरीबी का ऐसा डेरा कि एक वक्त खाना बन जाए तो, दूसरे वक्त पानी  पीकर ही रहना पड़ता था दोनों पति-पत्नी को। सन्नाटे और दर्द के साये में घिरा, अँधेरा, घुटा-घुटा सा घर - शारीरिक और भावनात्मक रूप से टूटे व कमजोर, मास्टर सोहन के लिए, सोते-सोते मर जाने के लिए काफी था। तोषी ने अपनी संगीत मंडली व अन्य कुछ परिचितों की सहायता से मास्टर साहब की अर्थी तैयार की, व मंजीरे और ढोलक सहित भजन गाते हुए उन्हें पूरे सम्मान के साथ श्मशान घाट ले गया। पूरी श्रद्धा से अन्तिम संस्कार कर, फिर उसी निर्लिप्त भाव से अपनी रोज की ज़िन्दगी में लौट आया। ऐसा साधु, ऐसा सन्यासी तो हिमालय की कन्दराओं और बनों में भी ढूँढे नहीं मिलेगा, जैसा तोषी संसार की सांसारिकता में रह कर था। यह सब उसकी आदत में शुमार था। यह सब कुछ वह किसी को दिखाने के लिए या अपनी महान छवि बनाने के लिए नहीं करता था, वरन् ऐसे अवसरों पर उससे रुका नहीं जाता था। उसके कदम बरबस ही उस ओर उठ पड़ते थे, जहाँ उसकी जरूरत होती थी। पर जरूरत पड़ने पर, तोषी के आड़े समय में कितने मिलने वाले उसके साथ खड़े होते हैं - कभी-कभी यह प्रश्न, उसकी माँ को व्याकुल करता था। जब माँ उसके मिलने वालों के प्रति अपना के प्रति रोष पकट करती,  तो तोषी ठहाका लगाकर कहता -

“बुरा न मानो होली है, अरे अम्मा! अगर तुम यही गिनती रही, यही देखती रही कि मेरा किसने साथ दिया और किसने नहीं, तो खाना, सोना और जीना सब भूल जाओगी। सो माँ मेरी, अपने इस तोषी की तरह मस्त बन जाओ और प्रभु के गुण गाओ।“

अम्मा हँसती और हमेशा यही कहती कि “मस्त तो मैं रहती ही हूँ और प्रभु के गुण भी गाती हूँ क्योंकि मुझे उसने तेरे जैसा सोने सा बेटा जो दिया है... बस, तेरी जैसी ही सोने सी बहू और...;“  तोषी वही माँ को चुपकर आगे बोलने ही न देता और कहता - “शुभ-शुभ बोलो!“

पिछले कुछ दिनों से तोषी खोया-खोया और उदास रहने लगा था। यद्यपि दिनचर्या बिल्कुल सही और स्वस्थ चल रही थी, फिर भी न जाने उसे कैसा ‘खालीपन’ ग्रसे हुए  था! आजकल उसे सब कुछ अर्थहीन सा लगने लगा था।

 

खुले आकाश के नीचे आँगन में खोड़ी चारपाई पर पड़ा वह, अक्सर घन्टों आँखें मूँदें रविवार का दिन आत्मविश्लेषण करते हुए बिता देता । उसे कभी-कभी लगता है कि वाकई वह अकेलेपन का शिकार हो गया है। माँ, भाई, दोस्त, सब ठीक ही कहते थे कि उसे शादी कर लेनी चाहिए थी। लेकिन नहीं - दिमाग तर्क पेश करता - अकेले रह कर जिस व्यवस्था से हर ध्येय को नियोजित कर वह हासिल कर सका, भाईयों का जीवन बना सका, तब क्या वह इतनी आजादी से इतना सबकुछ कर पाता? शायद ‘नहीं’ - शायद ‘हाँ’ भी - मन उसे उलझाता। इसका निर्णय तो जीवन साथी की उदारता, अनुदारता, उसका स्वभाव और सोचविचार करता। तभी दहलीज का दरवाजा चरमराया। तोषी झटके से उठा तो क्या देखता है कि दिवाकर दो भारी-भारी सूटकेस लिए आँगन में खड़ा था- हँसता मुस्कुराता। उसने झुक कर माँ और तोषी के पैर छुए और गले लग गया। तोषी की तो खुशी का ठिकाना न रहा। बोला - “अरे, आने की खबर तो कर देता।“

दिवाकर शरारत से बोला - “खबर कर देता तो आपको और अम्मा को चौंकाता कैसे?“ देर रात तक खूब बातें होती रहीं। अगले दिन शाम को जब तोषी की मित्र मंडली आई तो, दिवाकर ने भी शामिल होकर और भी जोर शोर से संगीत की बैठक जमाई। सबके चले जाने के बाद, रात का खाना खाते समय दिवाकर तोषी से बड़े प्यार से, किन्तु एक अधिकारपूर्ण निर्णयात्मक स्वर में बोला -

 “भाईसाहब इस बार मैं लम्बी छुट्टी लेकर आया हूँ - इस इरादे से कि एक प्यारी सी भाभी घर में लेकर आऊँगा। देखिए, अब तक आपने अपनी चलाई। हमें लेकर आपने सारी इच्छाएँ, सपने भी पूरे किए। पर अब आप हमें हमारी इच्छाएँ, हमारे सपने पूरे करने दीजिए।“

तोषी कुछ बोलने को हुआ तो दिवाकर ने बीच में ही फैसला सुना दिया कि - “बोलिए कुछ भी बोलिए - पर शादी के लिए न के अलावा कुछ भी बोलिए। घर में कदम रखा तो, अकेले चारपाई पर पड़े आप, दूसरी ओर बराम्दे में लेटी हुई गुमसुम अम्मा। कैसा उदास और सन्नाटे में डूबा घर लगा, अन्दर घुसते ही। भाभी होगी तो रौनक रहेगी, घर की बात ही कुछ और होगी।“

तोषी आज्ञाकारी की तरह दिवाकर की बातें सुनता रहा। उसे दिवाकर के सोच पर, अपने लिए उस ख्याल और प्यार पर खुशी भी हो रही थी, पर दिल के किसी कोने में एक अंजाना डर उसे खाए जा रहा था कि तेज तर्रार या नासमझ जीवन संगिनी आ गई तो क्या होगा? तभी दिवाकर ने अगला ट्रम्प कार्ड फेंकते हुए कहा -

 “दशहरे पर दिल्ली से शेखर भय्या और भाभी भी आने वाले है - उस फोटो के साथ - जिसे हम सबने तो बहुत पसन्द किया है, पर अब आपको अपनी राय देनी है।“

यह सुनकर तोषी घबरा सा गया। वह अब तक दिवाकर की बातों को बड़ी शान्ति और सहजता से यह सोचकर ले रहा था कि शादी का मसला अन्तिम रूप लेते-लेते लम्बा समय तो लेगा ही और सम्भव है लम्बे अर्से में शादी की बात टल जाए। किन्तु दिवाकर की अगली बात से तो तोषी को दिवाकर की भाभी उसी क्षण घर में बैठी नजर आने लगी।तो ये दोनों छुट भय्यै इस बार मेरी शान्ति भंग करने पर उतारू है। दोनों ने चुपचाप लड़की भी देख ली और दिवाकर पहले ही से आकर मेा ‘ब्रेनवाश’ करने में लगा है। तोषी भाईयों की प्यार भरी चतुरता से गदगद हो उठा किन्तु दूसरे ही पल फिर उसे चिन्ता सताने लगी।

*

शेखर और जया दशहरा की छुट्टियों में आए हुए थे। वे तोषी को लड़की की फोटो भी दिखा चुके थे; और तोषी को लड़की पसन्द भी आ गई थी, परन्तु वह स्वयं को शादी के लिए तैयार नहीं कर पा रहा था। माँ, दोनों भाईयों और जया - सभी ने तोषी को बार-बार समझाया कि जितना नकारात्मक वह वैवाहिक जीवन को समझ रहा है, ऐसा सच में कुछ भी नहीं है। आखिर शेखर और जया भी  तो खुशी-खुशी रह रहे है। तोषी के अनेक मित्र भी गृहस्थी बसा कर सुख से रह रहे हैं। खूब तर्क-वितर्क और सोच-विचार के बाद दिवाकर और शेखर, तोषी को विवाह के लिए तैयार करने में सफल हो गए। उन्होंने इस शुभ काम में देर करनी ठीक नहीं समझी। दिवाकर तो वैसे भी तीन माह की छुट्टी लेकर आया था, सो दिसम्बर के पहले हफ्ते में शुभ मुहूर्त देखकर शादी की तारीख निश्चित की गई।

      शादी की सभी रस्में तोषी के मना करते-करते भी पूरी की गई, लेकिन सादगी से। जब कल्याणी के साथ तोषी ने घर में कदम रखा तो खुशी से पुलकित माँ ने बड़े ही चाव से दोनों की आरती उतार कर, टीका करके मुँह मीठा कराया और ढेरों आशीष वचनों के साथ अपने प्यारे बेटे व बहू का घर में स्वागत किया। माँ का कमजोर शरीर जैसे बहू के घर में आते ही जीवन्त हो गया। सलोनी सी भाभी के आगमन से शेखर, जया, दिवाकर भी बड़े उत्साहित थे। घर में खूब रौनक और चहल पहल थी, किन्तु तोषी - चाहकर भी सहज नहीं हो पा रहा था। शरमाया, हिचकिचाया सा अपने ही घर में अजनबी सा हो गया था मानो ! कल्याणी बहुत अच्छी थी, रूप, गुण और स्वभाव, सभी में बढ़-चढ़ कर थी। कभी- कभी तोषी को लगता वह गुणी कल्याणी के लायक नहीं। पता नहीं; वह उसे सुखी रख पायेगा या नहीं - क्योंकि वह अपने मूड़ी और एकाकी स्वभाव से स्वयं भी डरता था। देखते ही देखते दिवाकर की छुट्टियाँ भी खत्म हो गई और एक-एक करके शेखर, जया, दिवाकर सभी वापिस चले गए। घर में रह गए तीन प्राणी - अम्मा, तोषी और कल्याणी।

      कल्याणी ने बड़ी कुशलता और सुघड़ता से घर सम्हाल लिया था। किशनो को वह ‘मौसी’ कह कर बुलाती। माँ की बड़े प्यार से सेवा करती। तोषी पर तो उसका सब कुछ न्यौछावर था। तोषी के मित्रों की आवभगत में भी वह कोई कसर न छोडती। तोषी कल्याणी की सुघड़ता और कर्मठता से बड़ा प्रभावित था।

 

कुछ समय तक सब ठीक चलता रहा। किन्तु छः माह बीतते-बीतते, कल्याणी परेशान रहने लगी। क्योंकि अकेले रहने का, फक्कडपन से जीने का आदी, तोषी उसकी हर बात की रुखेपन से उपेक्षा कर देता। वह यदि कहती कि “धुली, प्रेस की हुई कमीज पैन्ट पहन कर कॉलिज जाइएगा“, तो तोषी को उसका ऐसा कहना जरा भी न भाता और वह मुसी-तुसी कमीज पहन कर चलता बनता। कल्याणी जब भी शाम को कभी कभार शहर के इकलौते ‘इन्द्रापार्क’ में घूमने जाने की बात कहती तो, तोषी अनिच्छा दिखाकर, उसे अकेले घूम आने को कहता। कभी उसका दिल रखने को बाजार तक भी साथ लेकर नहीं जाता। ऐसे ही खाने-पीने में भी वह उसका कभी साथ न देता। कभी वह मन से विशेष चीज उसे खुश करने के लिए बनाती, तो तोषी को कोई फर्क न पड़ता। प्यार तो वह उसे करता था - पर उसे स्वयं को कल्याणी के अनुरूप ढालना नहीं आ रहा था। जब कि कल्याणी ने स्वयं को तोषी के अनुरूप काफी बदल लिया था, पर इस साँझे परिवर्तन का तात्पर्य यह नहीं था कि उसका अस्तित्व ही शून्य हो जाए। परिवर्तन दोनों ओर अपेक्षित था। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह कौन-सा बिन्दु था जिस पर पहुँचने पे तोषी उसे सहजता से स्वीकार कर ले। कभी तो तोषी में उसे वह प्यार और ख्याल की उमंग दिखे, जिसके लिए वह तरसती है! पर वह तरसती ही रही और तोषी उसे जानकर नहीं - वरन् अन्जाने में तरसाता रहा। उल्लसित, हुलसित कल्याणी धीरे-धीरे मुरझाई-मुरझाई रहने लगी। वह स्वयं को ‘उपेक्षित’ महसूस करने लगी। तोषी को कोई फर्क नहीं पड़ता था - चाहे वह घर में रहे या 10-15 दिन को मायके चली जाए। माँ तो कल्याणी की सेवा से इतनी खुश थी कि फूली न समाती थी। किशनो भी बहूरानी के गुण गाते न थकती। एक तोषी ही था जो उसके अलावा - सब पर ध्यान देता, पर कल्याणी के सेवा भाव, प्यार, ख्याल पर उसे कभी लाड न आता। दरअसल, वह कल्याणी की मानसिकता, भावनात्मक खालीपन को महसूस ही नहीं कर पाया था। सलीके से कपड़े पहन कर, चुस्त होकर, घर से बाहर जाने की बात सुनकर - तोषी को लगता कि कल्याणी उसके  सहज जीवन को असहज बना रही है। बाजार साथ जाने और पार्क में साथ-साथ घूमने जाने की मनुहार को तोषी ने बोझ और बंधन  माना। कल्याणी भी अपने मन को, अपने अस्तित्व को कहाँ तक कुचलती! भावनात्मक मौत एकदम नहीं धीरे-धीरे आती है - रोजमर्रा की, जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी, पर महत्वपूर्ण भावनाओं के एक के बाद एक आहत होने पर। एक दिन वह पल आ पहुँचा, जब उपेक्षित कल्याणी ने हार कर तोषी से हमेशा के लिए दूर जाने का निर्णय, दुखी और बेहद दुखी मन से ले ही लिया। विवाह- स्वस्थ भागीदारी, साँझे समझौतो की बुनियाद से शुरु होकर परस्पर प्यार और सम्मान से पोषित होता है और पति-पत्नी की एक दूसरे के प्रति समर्पण व निष्ठा की भावना उसकी जडें मजबूत करती है। बेहद समझदार, सम्वेदनशील, विचारशील, माँ-बेटे, भाईयों, मित्रों आदि के रिश्तों की नजाकत व गरिमा को बखूबी समझने वाला - तोषी, विवाह के रिश्ते की नजाकत और गरिमा को समझने में असफल  रहा। या बेमन से किए जाने वाले काम के प्रति व्यक्ति जैसे लापरवाह होता है - वही रुख कुछ-कुछ तोषी का शायद बेमन से किए गए, सबके द्वारा उस पर थोपे गए विवाह के प्रति और उसके माध्यम से सौगात में मिली कल्याणी के प्रति था। पर इस सब में बेचारी कल्याणी का तो कोई दोष नहीं था। तोषी अंजाने में ही कल्याणी को बात-बात पर आहत कर भावनात्मक जडता की ओर धकेल रहा था। कल्याणी न चाह कर भी वैसी बनती जा रही थी। पति को प्यार करने वाली कल्याणी उसके प्रति तनिक भी कठोर नहीं बनना चाहती थी - पर भावनात्मक ठन्डापन उसे जकडता जा रहा था। दोनों में से कोई भी जानकर कुछ नहीं कर रहा था। फिर भी अनहोनी घटती जा रही थी। शायद अलगाव ही उन दोनों की नियति में था।

 

कल्याणी इस बार जो मायके गई तो लौट कर ही नहीं आई। तोषी ने उसके उस निर्णय को अहंकार समझा, जबकि वह अहंकार नहीं, कल्याणी की पीड़ा थी। दोनों को एक दूसरे से दूर रहते हुए, पहले एक महीना बीता, फिर दो, फिर तीन, फिर चार और हर मिनट, हर पल हर दिन रुठी कल्याणी इस बीच उम्मीद करती, चुप-चुप बाट जोहती रही कि तोषी अकेलेपन से घबरा कर, दौड़ा-दौड़ा उसके पास आयेगा और उसे साथ ले जाएगा। शनैः शनैः यह आस, निराशा में बदलने लगी। फिर बीतते महीनों के साथ जैसे उन दोनों की बीच की बची-खुची निकटता भी बीतने लगी। दोनों ही कष्ट और पीड़ा में थे। खामोश रह कर उसे और बढाते जा रहे थे। कल्याणी तड़प कर सोचती - काश! एक बार तोषी उससे प्यार से घर लौट आने की बात कहे। भले ही लेने न आए, एक फोन ही कर दे, तो वह सब मान-सम्मान भूलकर दौड़ी चली जायेगी। पर उधर तोषी को लगता कि वह क्यों कल्याणी के आगे झुके, जैसे खुद गई है वैसे ही वापिस भी आए। अगर वह साथ नहीं रहना चाहती, तो न रहे। मैं तो पहले ही कहता था, जानता था, विवाह के लिए मैं अनाड़ी आदमी हूँ, पर किसी ने एक नहीं सुनी मेरी। एक दूसरे से इस तरह की आशाओं ने तोषी और कल्याणी के मध्य की दूरी इतनी बढा दी कि फिर एक वर्ष का लम्बा समय बीत जाने पर, दोनों में से, किसी से भी वह फासला तय न किया गया।

तोषी के घर कपड़ों, चादरों आदि से भरा कल्याणी का एक बक्सा अभी तक रखा था। तोषी के लिए कल्याणी के लौट आने का, अब एक वही ‘अन्तिम सहारा’ था। भले ही तोषी ऊपर से शान्त दिखता था, पर अन्दर ही अन्दर वह बेहद अशान्त और टूटा हुआ था। दिन पर दिन वह कल्याणी की कमी अधिक महसूस करने लगा था। अब उसे कल्याणी की हर छोटी से छोटी बात और उसके साथ अपना रुखा बर्ताव -सब कुछ रह रह कर सताने लगा था। कोई क्षण ऐसा न था जब वह उठते-बैठते, खाते-सोते न पछताता हो। अपने क धिक्कारता था कि इतनी अच्छी पत्नी की कितनी बेकद्री की उसने...! अब वह सोचने लगा था कि जिस दिन कल्याणी अकेली या भाई के साथ उस बक्से को लेने आयेगी; उस दिन प्यार से वह उसका हाथ पकड कर हमेशा के लिए रोक लेगा - पूरी तरह उसके आगे समर्पण कर देगा। मन ही मन स्वयं को उस शुभ घड़ी के लिए तैयार करता, तोषी एक-एक दिन, एक-एक हफ्ता, एक-एक महीना गिनता रहा, पर कल्याणी न आई।

उसकी जगह आया उसका सन्देशा। दिल्ली से बिजनौर जाने वाले एक व्यक्ति के हाथ कल्याणी ने यह सन्देशा भेजा कि -

“अगर तोषी को आपत्ति न हो तो वह उसका बक्सा सन्देशवाहक के साथ भेज दे।“

सन्देशा पाकर तोषी का दिल बैठ गया। वह अन्दर से निष्प्राण सा हो गया। न जाने क्या-क्या सोचता, उदास, चारपाई पर औंधे मुँह पड़ा रहा। घन्टो पीड़ा के सागर में गोते लगाकर खुद पर व्यंग से हँसा। आत्मालाप में उसने स्वयं को धिक्कारा -

“वाह तोष! दूसरों का जीवन बनाने वाले, सँवारने वाले, तुझसे अपना ही जीवन न बनाया गया? इतनी अच्छी बीवी की कदर न जानी! उसे घर से जाने पर मजबूर कर दिया? क्या गलती थी उसकी - कि तेरा घर सम्हालती थी, तेरी माँ की तुझसे भी ज्यादा सेवा करती थी? इतने कम समय में माँ की उसने इतनी सेवा की थी, इतना सुख दिया था, प्यार दिया था, जितना तू आज तक भी न  कर पाया। क्या गलती थी उसकी कि वह तुझे, तेरे जीवन को सँवार कर व्यवस्थित करना चाहती थी और बदले में थोड़ा सा तेरा प्यार भरा साथ चाहती थी! वाह रे तोषी वाह! अब झेलो अपने अकेलेपन को! यार तोषी इस जनम में तो तू नालायक के नालायक ही रहा, निरा मूरख, अनाड़ी!  उसके कहने से थोड़ी अपनी आदते सँवार लेता तो क्या बिगड़ जाता?“

 

अगले दिन सन्देशवाहक बक्सा लेकर जाने वाला था। तोषी ने आँगन में बिछी चारपाई पर, बक्से का सारा सामन धूप लगाने के लिए बड़े प्यार से लगाया। एक-एक कपड़ा निकालता और हर कपड़े की परतों में लिपटी यादें उसका दिल सालने लगती। शाम को बक्से को झाड़ कर, साफ करके, करीने से उसमें कल्याणी का सारा सामन फिर से लगा दिया। फिर कुछ सोचता रहा। अपने उमड़ते आँसुओं को जबरन रोकता रहा पर जब रुका न गया तो अन्दर कमरे में जाकर फफक पड़ा। किसी तरह अपने को सम्हाला। एक कागज पर लिखा -

“हो सके तो अपने इस गुनहगार को माफ कर देना“ - और उसे बक्से में कपड़ों पर खकर, बक्सा बंद कर ताला लगा दिया।

जब  अगले दिन सन्देशवाहक व्यक्ति आया तो तोषी ने भारी मन से बक्सा उसके सुपुर्द कर दिया।  तोषी को लगा जैसे उसका सब कुछ  चला गया। इतना व्याकुल तो  वह कल्याणी  के  जाने पर भी  नहीं हुआ था जितना इस बक्से के जाने पर हुआ। शायद उसने अपना सारा  प्यार, ख्याल  अपनी वे सारी कोमलतम  भावनाएँ, सम्वेदनाएँ, गहरे सोच - इस  बक्से से  जोड़ लिए थे, जो उसे कल्याणी से  जोड़ने  चाहिए  थे। उसे  बड़ा पछतावा होता रहा कि उसने कल्याणी का दिल, उसकी भावनाएँ क्यों न  समझी? क्यों अन्जाने ही उसकी उपेक्षा करता रहा। बक्से का प्रसंग तो खत्म हुआ, पर  तभी तोषी को महसूस हुआ कि जीवन के कुछ भावी प्रसंग अभी शेष है जो दिल से जुड़े है !  सम्भव  है, वे उसे पुनः  कल्याणी से जोड़ दें! नहीं  भी  जोड़े, तो  भी उन खामोश ‘शेष प्रसंगों’ के  सहारे ही  वह  अपना  एकाकी  जीवन  काट देगा। सकारात्मक  और सुखद आशाएँ  जीवन  जीने  का  बहुत  बड़ा  सहारा  होती  है। घर  फिर उसी  उदासी और  सन्नाटे से  भर गया था।  यह  उदासी  और  सन्नाटा  पहले  से  अधिक  गहरा  और  कचोटने  वाला  और तोषी को  असहज  बनाने वाला था।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

......गिलहरी
|

सारे बच्चों से आगे न दौड़ो तो आँखों के सामने…

...और सत्संग चलता रहा
|

"संत सतगुरु इस धरती पर भगवान हैं। वे…

 जिज्ञासा
|

सुबह-सुबह अख़बार खोलते ही निधन वाले कालम…

 बेशर्म
|

थियेटर से बाहर निकलते ही, पूर्णिमा की नज़र…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

पुस्तक समीक्षा

लघुकथा

कहानी

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं