अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सृजनशील दो हाथ

दो हाथ इंसान के
कर देते हैं सृजन,
दो हाथ हैवान के,
करते हैं संहार;
यही तो है संसार!
हिमालय से लेकर गंगा-सागर तक,
उत्तर से दक्षिण; पूरब से पश्चिम तक,
जहाँ भी देखोगे सृजन
याद आएँगे दो हाथ इंसान के!
 
हिरोशिमा-नागासाकी से लेकर
मुंबई के ताज और नरीमन हॉऊस तक
जहाँ-जहाँ भी देखोगे संहार का तांडव,
याद आएँगे दो हाथ हैवान के!
 
ये दो हाथ
मिट्टी में डालते हैं बीज
तो उग आती हैं फसलें दानों की
इंसान लड़ता है भूख के राक्षस से;
ये दो हाथ,
लेकर एटम बम और हथियार,
मचा देते हैं जब भीषण संहार
हैवान हँसता है लाशों के अम्बार पर!
 
सोचता हूँ मैं,
क्या ये दो हाथ ही हैं जिम्मेदार?
कब हो सृजन? कहाँ हो संहार?
 
नहीं, नहीं, मेरे मित्र!
हाथ तो हाथ हैं, सिर्फ़ हिलते हैं,
सृजन और संहार तो चिंतन में पलते हैं!
 
चिंतन जब करता है इंसान,
तब हँसता है सृजन,
खिलते हैं फूल, हँसती हैं फसलें!
 
चिंतन जब करता है हैवान,
तब अट्टहास करता है संहार,
जलती हैं बस्तियाँ, मरते हैं मासूम!
चिंतन सार्थक हो तो उगती हैं संस्कृतियाँ,
चिंतन विकृत हो तो जलती हैं संस्कृतियाँ!
 
इसीलिये युगों-युगों से
एक ही संदेश देती आयी है धरती,
अपनी संतानों को;
मैं तुम्हारी माँ हूँ मेरे पुत्रों !
जन्मा है तुम सबको कोख से अपनी,
और दिया है तुम्हे वरदान सृजन का!
चिंतन में ढालो सृजन, पुत्रों!
 
तब हाथों में हथियार नहीं होंगे,
कर्म के औजार होंगे
और तब तुम्हारे हाथो से उगेंगे फूल,
तब मैं दूँगी भरपूर फसलें दानों की,
तब भूख हार जायेगी तुमसे !
 
धरती का यह संदेश--
आज नहीं तो कल, ज़रूर सुनेगा हैवान भी,
क्योंकि भूख तो उसकी भी दुश्मन है,
संहार मिटाता है उसको भी!
 
फैलाना होगा सृजन का संदेश चारों ओर
सृजन का चिंतन बोना होगा सभी दिशाओं में,
तभी,हाँ! तभी, हारेगा हैवान,
तभी विजयी होगा इंसान!
और तभी सृजन करेंगे--
सृजनशील दो हाथ!
फिर से खिलेंगे मोहक फूल,
फिर से उगेंगी लहलाती फसलें
फिर से जीतेगी इंसानियत!

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

दोहे

ग़ज़ल

बाल साहित्य कहानी

बाल साहित्य कविता

कहानी

गीत-नवगीत

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं