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सुरंगमा यादव हाइकु - 1

1. 
जीवन घट
कर्म जल पूरित
बुलावा आया।

2. 
कर्मों का फल
बिन सोचे करनी
त्रिशंकु बने।

3. 
धरा कुटुम्ब
सब जन अपने
यही संस्कृति।

4. 
लोभ न आये
देख पराया धन
बुरी बला ये।

5. 
पीर परायी
अपनी-सी समझे
मनुज वही।

6. 
निज सुख दे
परदुःख ले लेता
प्रिय सभी का।

7. 
चंचल मन
आकर्षक बुराई
सहज खींचे।

8. 
स्वयं पारखी 
निज गुण ज्ञान का
आत्म मुग्ध मैं।

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