अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

टेक केयर

अस्सी वर्षीय नवेन्दु प्रकाश दिल्ली में सफ़दरजंग अस्पताल के वार्ड 13 में बिस्तर पर करवट बदलते हुए अपने बीते दिनों को याद कर रहे थे। उनका इकलौता बेटा कोलकाता में एक विदेशी कंपनी में सेवारत है। बहू बंगाली है और वह भी वहीं एक स्कूल में अध्यापिका है। वे पत्नी के साथ दिल्ली में विकासपुरी रहते हैं। कुछ वर्ष पहले वे बेटे-बहू के कहने पर सपत्नीक कोलकाता गए थे लेकिन तीन महीने बाद वे वापस आ गए थे। पत्नी को गठिया है। फलस्वरूप, वह चाहते हुए भी दौड़धूप करने में असमर्थ हैं। 

यकायक नवेन्दु जी जब ज़ोर से हँसने लगे तो उनके बाजू के बिस्तर पर लेटे रोगी ने उनसे पूछा, "बाबू जी, क्या हुआ? आप इतनी ज़ोर से क्यों हँस रहे हैं?"

सवाल सुनकर नवेन्दु जी को ख़्याल आया कि वे इस वक़्त अस्पताल में हैं। तुरंत अपनी उन्मुक्त हँसी को रोकते हुए वे बोले, "शंकर सुबह से मुझे नौ-दस लोग फोन कर चुके हैं। जिसे देखो वह इस अस्सी साल के बीमार से बस यही कहता है-'टेक केयर।' बेवकूफ़ों को यह भी मालूम नहीं कि एक बीमार बूढ़ा अपनी केयर कैसे कर सकता है?”

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं