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तन्हा सफ़र

गिर गिर के हमें सँभलना,आया है दोस्तो
ये यूँ ही नहीं, भाया है दोस्तो

 

इस दिल ने जब भी माँगी हैं, मासूम तमन्नाएँ
क़ैद-ए-फ़र्ज़ में ख़ुद को, घिरा पाया है दोस्तो

 

मेरे साथ जो चलता रहा, बन कर हमक़दम
कोई साथी नहीं, वो मेरा ही साया है दोस्तो


 झुलसा सकी ना, संघर्ष की धूप भी उसको
मेरे गुंचे1 पर, बूढ़े दरख्तों का साया है दोस्तो

 

मंझधार से निकल, सफ़ीना2, आ लगा किनारे
ख़ुदा का हाथ, जब हाथ में, आया है दोस्तो 

 

चले हैं नई राह पर, नक़्श-ऐ-पा3 के बगैर हम 
इस मंज़िल का मज़ा, तभी तो आया है दोस्तो 

 

ख़ुश क़िस्मत हमको अब कहने लगे रक़ीब4 भी
हमारे दर्द हैं पोशीदा5, निशात6 नुमाया7 है दोस्तो

 

1. गुंचा= कली; 2. सफ़ीना=नाव, किश्ती; 3. नक़्श-ऐ-पा=पद-चिह्न; 4. रक़ीब=प्रतिद्वंद्वी; 5. पोशीदा= छुपा हुआ; 6. निशात= हर्ष, ख़ुशी; 7. नुमाया= प्रकट

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