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तिरंगे की व्यथा

हृदय गति रुकने से एक महाशय की ज़िन्दगी को विराम लग गया। सर्वत्र दुख के समाचार बुराई की भाँति फैल गए।

अगले दिन जब उनकी अंतिम यात्रा चल रही थी तो उनकी यात्रा को कंधा फौज का एक सिपाही दे रहा था। तभी उस सिपाही के कानों में किसी के सिसकने की आवाज़ आई। सिपाही ने सोचा कि कहीं मृत शरीर ही तो सिसकियाँ नहीं भर रहा है। तभी मृत शरीर से लिपटा तिरंगा बोला- "ये सिसकियाँ और किसी की नहीं, मेरी हैं, मुझे इस नेता के शरीर के साथ लपेट जो दिया गया है, जिसकी ज़िन्दगी के सभी दिन झूठ, बेईमानी व अनैतिक आचरणों में बीते। जिसने सिर्फ अपने व अपने परिवार का हित सोचा। देश और समाज जिसके लिये स्वार्थ हल करने मात्र के शब्द रहे। खून बहाना तो दूर, जिसनें कभी देश के लिये पसीना तक नहीं बहाया। ये सब लोग उसके सम्मान के चक्कर में मेरा अपमान कर रहे हैं। काश! मैं सीमा पर लड़ते-लड़ते देश के लिये शहीद हुये देशभक्त के मृत-शरीर पर लिपटाया गया होता या फिर उस किसान के शरीर पर जिसने अपनी सारी ज़िन्दगी भारत माता के निकटस्थ रह कर बिताई। जिसनें देश से मातृवत्-पुत्रवत् संबंध रखा, तो मैं समझता कि उन्होंने मेरा सम्मान किया। इसलिए हे सिपाही! सिसकने वाला और कोई नहीं,'मै तिरंगा हूँ'।

यह सुनकर सिपाही बोला - "ये ही स्थिति मेरी भी हो रही है। मेरा काम देश की रक्षा करना, उसका भार उठाना है परन्तु हमसे भी इस प्रकार का भार उठवाया जा रहा है, हम किससे अपनी व्यथा कहें...

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