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टॉमी और बंदर

बच्चों आज तुम्हें टॉमी और बंदरों की मनोरंजक कहानी सुनाना चाहती हूँ पर सोचती हूँ कि पहले टॉमी का परिचय दूँ या बंदरों का। चलो दातागंज के नटखट बंदरों का ही परिचय पहले कराती हूँ। वैसे तो बंदर हर स्थान के लोगों को परेशान करते हैं परंतु दातागंज के बंदरों की ख़ासियत यह है कि वे नटखट होने के साथ ही बुद्धिमान भी बहुत हैं। टंकी में लगे नल को खोलकर पानी पी लेना और दरवाज़ा खुला मिल जाये तो फ्रिज से फल, सब्ज़ी आदि लेकर भाग जाना, रोटी पाने के लिये सूखने डाले गये कपड़ों में से सबसे अच्छे कपड़े लेकर छत पर भाग जाना और प्रतीक्षा करना कि कोई आये और रोटी दे। रोटी न देने पर उसे दिखा-दिखा कर कपड़े के चिथड़े-चिथड़े करना आदि तो साधारण बातें हैं। उनकी शैतानी और चपलता असाधारण हैं। अब तो वे टंकी का ढक्कन तोड़कर उसमें नहाकर स्विमिंग पूल का आनंद भी लेना सीख गये हैं।

बहुत पहले की घटना है उस समय दातागंज में बरात-घर नहीं होते थे और बरातें बाग़ों में रोकी जाती थीं। दावत में हिस्सा बटाने के लिये बंदर भी वहाँ अपनी टोली लेकर पहुँच जाते थे। उन दिनों बरातें तीन दिन रुकती थीं और पंडित, नाई के अतिरिक्त मालिश वाले, पॉलिश वाले, धोबी, आदि भी साथ होते थे। एक बार की बात है जब दातागंज में एक बरात ने डेरा डाला था। नाई, धोबी, मालिश करने वाले, पॉलिश करने वाले अपने-अपने काम में लगे थे। एक स्थान पर पेड़ के नीचे नाई ने हजामत की दुकान सजाई हुई थी और पेड़ पर वानर सेना अड्डा जमाये बैठी थी। एक बंदर बड़े ध्यान से नाई को उस्तरे से दाढ़ी बनाते देख रहा था। नाई किसी काम के लिये उठा कि इतने में उस चपल बंदर ने नीचे जाकर उस्तरे पर अधिकार कर लिया। जब बंदर पेड़ पर बैठा था तो उसकी नाक के ऊपर मक्खी भनभनाने लगी। बंदर ने अपने हाथ से मक्खी उड़ाने का प्रयत्न किया तो उसकी नाक में उस्तरे से कट गया और ख़ून बहने लगा। अब बंदर ने उस्तरा तो नीचे फेंक दिया और फिर नाक पर हाथ लगाकर देखा। खून देखकर वह कूँ करता और एक डाल से कूदकर दूसरी पर चला जाता। बराती उसका तमाशा देखते रहे। बंदर को अपनी करनी का फल मिल गया।

बच्चों तुमने यह कहानी तो अवश्य सुनी होगी या पढ़ी होगी कि बंदर बहुत नक़लची होते हैं। एक बार एक बुड्ढा सौदागर एक झोले में टोपी लेकर बेचने आया। वह पेड़ के नीचे बैठकर धंधा करने लगा। ग्राहक आते, टोपी पहनकर देखते और पसंद आती तो ख़रीद कर सर पर लगा कर चल देते। बंदरों की टोली पेड़ पर बैठकर सब देख रही थी। ज़रा सी बुड्ढे की आँख बची कि एक बंदर टोपी वाला झोला लेकर चम्पत हो गया। सौदागर चकित था कि झोला कहाँ ग़ायब हो गया। इसी बीच उसकी दृष्टि ऊपर पेड़ पर गई तो देखता क्या है कि कई बंदर सर पर टोपी लगाये बैठे हैं और कुछ टोपी को पकड़ कर लगाने का प्रयत्न कर रहे हैं। जो टोपी सर पर नहीं लगा पा रहे थे वे उसे फाड़ने की कोशिश कर रहे थे। बुड्ढा सौदागर यह देखकर रोने लगा। एक लड़का वहाँ खेल रहा था। वह हमेशा सबकी सहायता करता था. उसने कहा, "बाबा क्यों रोते हो? तुम्हारे पास एक टोपी हो तो मुझे दो। मैं अभी कुछ उपाय करता हूँ।" उसने टोपी बंदरों को दिखाते हुए सर पर लगाई। कुछ देर बाद कुछ बुदबुदाते हुए टोपी उतारकर नीचे फेंक दी। बंदरों ने उसे टोपी फेंकते हुए देखा तो ख़ुद भी टोपी फेंकने लगे। इस बीच लड़के ने अपने पास रक्खे चने कुछ दूर पर फैला दिये। बंदरों का ध्यान बँट गया तो वे चने बीनकर खाने लगे। लड़के ने शीघ्रता से टोपियाँ बटोर कर सौदागर को दे दीं। 

एक बार का एक मनोरंजक क़िस्सा मेरी भतीजी रानी ने सुनाया था। वह दातागंज में मेरी मम्मी के घर की छत पर सो रही थी। जब सूरज निकल आया तो उसका उठने का मन नहीं हुआ और वह मुँह पर चादर ढँक कर सो गई। इसी बीच एक बंदर का परिवार छत पर आ गया। बंदरों की आहट सुनकर रानी की रूह काँप उठी क्योंकि वहाँ के बंदर बहुत कटखने हैं। बंदर ने आकर शैतानी से रानी के मुख पर ढँकी चादर खोली और मुँह देखता रहा। रानी साँस साधे चुपचाप लेटी रही, तो बंदर ने चादर ढँक दी। अब क्या था वानर परिवार को एक खेल मिल गया। बारी-बारी एक बंदर आता और चादर उठा कर रानी का मुँह देखता और किलकारी मारता। यदि बंदरों की आवाज़ सुनकर मम्मी का सेवक दीनानाथ डंडा लेकर ऊपर न आता तो न जाने कब तक रानी की मुख दिखाई का खेल चलता रहता।

मैं अब तुम लोगों का परिचय अपनी मम्मी के पालतू कुत्ते टॉमी से कराती हूँ। टॉमी लगभग एक फुट लम्बा, छह इंच ऊँचा, भूरे-कत्थई रंग का बड़े-बड़े बालों वाला कुत्ता था। उसके कान लम्बे थे, आँखें गोल, बड़ी-बड़ी कजरारी थीं, जिनकी कोर गुलाबी थी। उसकी पूँछ पतली, लम्बी थी और उस पर बड़े-बड़े बाल थे। पैरों में बीस नाखून थे जो चलने पर छागल जैसे बजते थे। टॉमी को भगवान ने कद तो छोटा दिया था पर हिम्मत और बहादुरी ग़ज़ब की दी थी। वह अपने छोटे क़द से बेख़बर होकर बड़े से बड़े जीव पर भौंक कर झपट पड़ता था। भैंस, गाय, घोड़ा आदि तो टॉमी के भौंकने की लाज रखकर पीछे हट जाते थे जिससे उसकी हिम्मत बढ़ गई थी। एक बार एक बहुत बड़ा झज्झू बंदर मम्मी के आँगन में रक्खे सब्ज़ी के टोकरे से प्रेम से सब्ज़ियों का भोग लगाने लगा। भला ऐसे में स्वामिभक्त टॉमी यह कैसे बर्दाश्त करता? वह चेन में बँधे हुए ही ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा और चेन तुड़ाने का प्रयत्न करने लगा। बंदर ने एक बार हिकारत से उसे देखा और अपनी पेट-पूजा करता रहा। टॉमी ने किसी तरह गले से पट्टा निकाल लिया और ज़ोर-ज़ोर से भौंकते हुए बंदर की ओर दौड़ा। बंदर एक उपहास भरी दृष्टि टॉमी पर डालकर सब्ज़ी खाने में व्यस्त रहा। टॉमी अपने और बंदर के क़द के अंतर की परवाह किये बिना बंदर पर झपट पड़ा। अब क्या था बंदर के क्रोध का पारावार न रहा। उसने एक हाथ से टॉमी को पकड़ लिया और पहले तो दूसरे हाथ से उसके मुँह पर कई चपत लगाये और फिर अपने सामने गद्दे की तरह डालकर इतनी धुनाई की कि टॉमी चिंचियाता रह गया। वह चुपचाप जाकर बेदम सा अपने बिस्तर पर पड़ गया। कुछ बंदर के बच्चे लॉन में लगे गुलाचीन के पेड़ पर धमा-चौकड़ी कर रहे थे। वे एक दूसरे की पूँछ पकड़ कर लटकने का खेल खेल रहे थे, टॉमी की आवाज़ सुनकर तमाशा देखने आ गये थे। अब बंदर के बच्चों को नई शैतानी सूझ गई। एक बच्चे ने आकर टॉमी की पूँछ खींची और दौड़ कर छत पर चढ़ गया। जब तक टॉमी सम्हलता तब तक दूसरा बच्चा नीचे आया और उसने टॉमी का लम्बा कान खींचा और भाग लिया। टॉमी न जाने कब तक बंदर के बच्चों के मनोरंजन का साधन बना रहता यदि रानी और मम्मी टॉमी की चीख़ें सुनकर उसे बचाने न पहुँच जातीं।

बच्चों! इस घटना के बाद भी टॉमी की बहादुरी और तेज़ी में कमी नहीं आई है। केवल इतना अंतर आया है कि बंदरों को देखकर टॉमी शीघ्रता से एक बोरी के अंदर छिप जाते हैं और आँखें बंद करके ज़ोर से भौंकते हैं ताकि कोई न कोई आ जाये और बंदरों की ख़बर ले ले। 

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