अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सुनामी

अरबों का विध्वंस कर,
लाखों के प्राण पीकर,
किस आतंकवादी की हो अनुगामी?


रूप लिया एक भयंकर,
बन समुद्री भीषण लहर,
मानवता भयभीत करने की भरी हामी,


क्यों लिया मारने का व्रत?
और किया इतना हिंसक कृत?
किस ऋण का था मानव तुम्हारा असामी?


हुआ इंडोनेशिया पास भूकंपन,
और तुम हुई तत्काल उत्पन्न,
और चल दीं वेग गति से हो द्रुतगामी,


थायलैंड, श्री लंका, हमारा भारत,
और इंडोनेशिया आदि करने त्रस्त,
तुम्हारी तो होनी चाहिए खूब ही बदनामी,


परंतु देखो सारा जग कराह रहा,
लेकिन साथ में कहता भी जा रहा,
दिसंबर 26, 2004 को आई सुनामी,


हिन्दी शब्द कोश हो गया मुहताज,
जापानी शब्द का पहनकर ताज,
हो तुम ’भारतेन्दु’ प्राकृतिक तरंग बेनामी,


करो न तुम अब अत्यधिक अभिमान,
वैज्ञानिकों को हो गया तुम्हारा भान,
उपस्कर बनेंगे जो देंगे सूचना तब आगामी,


तब तक ईश्वर से मेरी यह विनय,
होने न देना इसका हिन्द महासागर में उदय,
जब तक यंत्र न लगें देते हुए सूचना पूर्वगामी।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं