अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सुनामी

आगत में स्वागत में रत उत्साहित था यह संसार,
मन में थे संकल्प अनेक, रोम रोम में नव संसार।

 

धरती ने जो ली अंगडाई, आया जग में इक भूचाल,
सुनामी की चली तरंगें, जीवन की बन ग्राही काल।

 

जाते जाते क्यूँ दे गया, गत वर्ष हमको यह संत्रास,
बिछड़े परिजन टूटे घर सब, हुआ अनेकों जन का ह्रास।

 

देख रहे थे छटा निराली, बिखरा सिकता सोना तट पर,
न जाने क्यूँ मचला करने, तांडव मतवाला ये सागर।

 

चारों ओर था अंधकार, मचा हुआ था हाहाकार,
पर भोली गुड़िया पर फिर भी, आया था सागर को प्यार।

 

उठा उसे बाहों में अपनी, बचा लिया यूँ सागर ने,
मानों कहता हो सागर से समझो छिपा भेद इसमें।

 

जीवन में आएँगे यूँ तो, नित नित जाने कितने क्लेश,
अंधकार में भी न छोड़ो, आशा है मेरा संदेश।

 

उठो करें स्वागत हम कल का, जीवन में हो नव संचार,
आशा की इस डोर को थामें, करना है हर बाधा पार।

 

सुमन समर्पित श्रद्धा के, उनको जो हो गए बह्म में लीन,
उन दुखियों के साथ हैं हम, काल ने जिनके लूटे नीड़।

 

नहीं हारना पुन: बनाएँगे, हम तट पर नीड़ नया,
करेंगे अभिनन्दन हम कल का, लेकर फिर संकल्प नया।

 

मंत्र है आशा ही जीवन का, कभी न दुख से मानों हार,
उठो साथियों दृढ़ निश्चय से, करें सृजित फिर नव संसार।।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी

पुस्तक समीक्षा

कविता

पुस्तक चर्चा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं