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तुम (भूपेन्द्र ’भावुक’

सिर्फ ‘तुम’
हाँ
सिर्फ ‘तुम’ ही तो हो
यहाँ
वहाँ
इसमें
उसमें
मुझमें
सबमें।
और आज से नहीं
जब ‘तुम’ मुझे-
इस कदर मिली हो,
बल्कि तब से
जब मैंने पहली बार
'तुम्हारे' पेट में
हाथ-पैर मारे थे।
मेरी आँखें खुली न होंगी
उस वक़्त
पर
मैंने ‘तुम्हें’ देख लिया था।
जब 'तुमने' मेरी नाड़ी काटी
और मेरे 'क्हाँक्हाँ' पर
'अल्लेलेले' कहा था
मैंने सुने थे
वो तुम्हारे बोल।
सुकून अथाह थे
उन लम्हों में
जब 'तुमने' मुझे
माथे पर चूमा था
और स्तनों से लगा लिया था। 
'तुम्हारे' साथ की ये यात्रा
अभी ख़त्म नहीं
बल्कि शुरू हुई थी।
मेरी कलाई पर
जो 'तुमने' स्नेह बाँधा था
वो आज भी-
कहाँ खुला है
और न कभी खुलेगा 
वो प्रेम
जो मैंने 'तुम्हारी' आँखों में-
देखा था।
आज भी तो
वही देख रहा हूँ।
वही ममत्व
वही स्नेह
वही भाव-
अपनेपन वाला।
कभी 'तुम' नाड़ी काटने आयी
कभी दूध पिलाने
तो कभी राखी बाँधने।
और आज भी तो
'तुम' आयी हो
गुलाब लेकर।
मैं 'तुम्हारी' आँखों में
वही स्नेह
वही वाला प्रेम-
देख पा रहा हूँ।
'तुम्हारा' रूप बदला है
निगाहें बदली हैं
प्रेम नहीं। 
न जाने कितने रूपों में
'तुम' मुझे बनाती रही हो।
मुझे ही नहीं
सबको बनाती रही हो
और बनाती रहोगी।
सब में 'तुम' हो
और 'तुम' में सब हैं
हाँ
'तुम' से सब हैं।

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