अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

तुम (डॉ. शैलजा सक्सेना)

तुम रात ओढ़ कर
मेरी नींद के सकोरे में
सपनों के कुछ सिक्के डाल कहाँ निकल गये?

मैं पेड पर टँगे चाँद पर पाँव जमा
उचकती हूँ
तुम्हें बादलों के पीछे ढूँढती हूँ
शायद तुम पहाड़ों पर पाँव रख दौड़ गये हो,
मैं पगलायी हवा सी
हर खोह में, हर गुफा में तुम्हें ढूँढती हूँ
तुम कहाँ हो?

तुम शायद आकाश गंगा के किनारे
निकल गये हो टहलने
तुम्हारे पाँवों के निशानों पर
जाने कौन तारों के फूल चढ़ा गया है
कि निशान भी छिप गये हैं
मैं तुम्हें ढूँढूँ तो कैसे?

दिशायें गूँज रहीं हैं,
तुम्हारी बाँसुरी की धुन काँप रही है मेरे भीतर
मैं धरती सी प्रतीक्षा में हूँ
कि अब बरसो, कि अब बरसो!

तुम नहीं आये तो
पहन कर भोर की जोगिया चादर
निकल जाऊँगी मैं भी घर से बाहर
फिर दिन की किरणों में बँध कर
ओस सी सोख ली गई तो
दोष मत देना मुझे!

जानती हूँ मेरा होना जितना कम है,
मेरा न होना उस से भी कम…
पर तुम्हारा होना मेरे लिए बहुत बड़ा है
इसी आधार पर तो मेरा होना खड़ा है
इसी स्वार्थ में भरकर
अपनी देह के भीतर,
चेतस की कुठहरिया से
आकाश गंगा तक बेचैन चक्कर लगा रही हूँ,
तुम कहाँ हो, तुम कहाँ हो??

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

साहित्यिक आलेख

पुस्तक चर्चा

कविता

नज़्म

कहानी

कविता - हाइकु

पुस्तक समीक्षा

कविता-मुक्तक

स्मृति लेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं