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तुमने गढ़ा है हमें 

ओ पृथ्वी!

तुम नाच रही हो लगातार

और तुम्हारे साथ- साथ

कई और पृथ्वियाँ भी

नाच रही हैं अथक

तुम्हारी ही तरह

नाचना सहज स्वभाव है उनका

 

 उनके हाथों और

पैरों के संचालन से

गतिमान है जीवन

उगते सूरज से लेकर

डूबते सूरज तक

फिर आसमान की चौकीदारी के लिए

पारी बदलकर आने वाले चाँद के आने

और बने रहने तक

 

ओ पृथ्वी!

तुम्हीं ने सिखाया हमें नाचना

और तुम्हीं ने बनाया भी हमें

यद्यपि तुमने रचा है सबको

पर हमें गढ़ा है

अपनी अंतरात्मा से

अपनी मिट्टी-देह का लचीलापन

हमें ही दिया तुमने

और अपनी ख़ामोशी के साथ-साथ

अपनी आत्मा की तरलता भी

अपना चुंबकत्व भी

सब भर दिया हमारे भीतर

 

तभी तो गीली मिट्टी की तरह

हम ढलती रही हैं कितने आकारों में

सबको तृप्त करने के लिए

तुम्हारी दी हुई ख़ामोशी

ख़ूब काम आती रही

कभी रनिवास में तो कभी वनवास में

तो कभी मौत की घाटियों से

नि:शब्द गुज़रती रहीं हम

हाथों में लिये अपना संसार

 

कितनी ॠतुओं को ओढ़ना पड़ता है हमें

तुम्हारी ही तरह

कभी वसंत-बयार

तो कभी धूप-ताप

तो कभी बारिश

तो कभी शीत

तो कभी पतझड़

इतनी भूमिकाओं को निभाते-निभाते

खो जाता है अपना चेहरा

आईना अजनबी बन जाता है

 

यह तो हम ही जानती हैं कि

कि हमारे भीतर

पूरा बह्मांड समाया हुआ है

अपनी अछोर दुनिया की साक्षी

मैं स्वयं हूँ – एक स्त्री

जो महसूसती हूँ मैं

वह दिखा नहीं सकती किसीको

बता नहीं सकती किसीको

कि समंदर - पठार

खेत-खलिहान

और पूरा गुलिस्तान

तो कभी बियाबान

और उसमें आँधियों-सी बहती

जलाती हवा

कभी सावन की बौछारें

तो कभी सूखी दरकती धरती

कभी हरे पेड़, हरे पत्ते

तो कभी पर्णहीन पेड़

और परित्यक्त उदास भूरे पत्ते . . . सब

सबको जीती हूँ मैं

तुम्हारी ही तरह

 

किसी और को

दिखाई न पड़ा हो मेरा नृत्य

पर मैं नाचती रही हूँ लगातार

और यही जाना-समझा

कि जिस दिन स्त्री नाचना बंद कर देगी

उसी दिन बंद हो जायेगा

ओ पृथ्वी! तुम्हारा भी नृत्य

और तुम्हारी दुनिया की धड़कन

रुक जायेगी

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