अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

तुमको तन-मन सौंपा

(आँसू छन्द)

 

इस छन्द में 14 मात्राओं के चार चरण, द्वितीय और चतुर्थ चरण तुकान्त। चरणान्त में 122/211होना चाहिये, लेकिन आज इसको नहीं माना जाता। जयशंकर प्रसाद नें 'आँसू' काव्य में इसका अपने ढंग से प्रयोग किया। दो लघु का भी प्रयोग किया है -

 

 1
तुमको तन -मन सौंपा था
तब गाती, बलखाती थी।
उर - सागर गहरे पानी
पंकज खूब खिलाती थी।

 

2
छल बनकर तुम ही मेरी
आँखों को छलकाते हो। 
हास छीनकर अधरों का
बस आँसू ढुलकाते हो!

 

3
धरम -करम से उजली थी
अपाला ऋषि कुमारी थी।
देह रोग से त्याग दिया
ये पीड़ा घन भारी थी!


 4
 मन ना काँपा पल तेरा
आँखें तूने ही फेरी।
सघन विपिन में छोड़ दिया
दमयन्ती मैं थी तेरी।


5
इंद्र छले पल में मुझको
तेरा दिल भी ना सीला 
कैसा ऋषि स्वामी मेरा?
युगों करा था पथरीला!!

 

6
मैं भोली तुझे बुलाया
कुंती का कौतूहल था।
सपन बहाया था जल में 
तुझ पर ना कोई हल था?

 

7
आदर्शों की हवि तुम्हारी
सिया -सपने जले सारे।
सागर ने तज दी सीपी
निर्जन में मोती धारे!

 

8
पापी लीन रहा देखो 
मेरे केशों को खींचा!
माँग भरी मेरी जिसनें
सर उसका क्यों था नीचा?


9
हिय झाँका होता मेरा
इक ऋतु ही उसमें रहती।
बुद्ध पार करे भव सागर
यशोधरा नद- सी बहती।


10
ऋषि मुनि राजा रे मन के
धरम -करम तप ध्यान किया।
नारी मन गहरे दुख का 
तूने ना रे मान किया।


11
योग-भोग, जागे-भागे
बनो कभी तो आभारी!
तेरे कुल के अंकुर की
मूल सभी मैंने धारी

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

कविता-मुक्तक

कविता-चोका

कविता - हाइकु

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं