अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

उद्धार/लोग क्या कहेंगे

विवाह योग्य लड़के के लिए माता-पिता लड़की देख रहे हैं, जानकर बेटे ने झिझकते हुए एक तस्वीर बढ़ाई, "जहाँ अन्य लड़कियाँ देख रहे हैं, उसमें एक ये भी देख लीजिए। यह मेरे साथ उसी संस्था में काम करती है।"

देख-सुनकर, समझदार, जागरूक, विचारवान, समयानुसार शक्ति और संसाधनों के बचाव के लिए परिवर्तनशील माता-पिता के लिए उसके अतिरिक्त और कोई विकल्प ही नहीं दिखाई दिया।

बेटे की पसंद जानकर माता-पिता ने बहुत कुछ सोच-समझ कर वर्तमान-भविष्य की दृष्टि से बिहारी-बंगाली सांस्कृतिक विचारगत विभेद अनदेखा कर,अन्तर्जातीय रिश्ता ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लिया है।

लड़का-लड़की राज़ी तो क्या करेगा क़ाज़ी? बहुत सी उलझनों से बचाव के लिए उनका, अपनी ज़िंदगी का फ़ैसला बेहतर ही है। बिना किसी दोषारोपण के, अपनी ज़िम्मेदारियों को जान-समझकर, ख़ुद से सँभालेंगे।

ईश्वर की कृपा से आवश्यकता भर घर-ज़मीन और संपदा परिश्रम से अर्जित कर ही ली है, जिसका कोई बोझ या तनाव बच्चों के लिए है ही नहीं।

दो बेटे हैं। फ़ालतू के झंझट-झमेले से दूर, जो भी है इन्हीं दोनों के लिए है। ये ख़ुश तो सब सही है। तिलक-दहेज़ बच्चों की ख़ुशियों के सामने कुछ भी नहीं। हमने अपने लड़के को पढ़ाया-लिखाया तो आज के समयानुसार बराबरी में लड़की भी तो पढ़ी-लिखी रहती है।

बिहार के नीतीश राज में खाँटी बिहारी बुद्धि, ससुराल वाले, लड़की की क़ीमत वसूलने का कोई अवसरवादी स्वार्थ त्याग नहीं पाते हैं। चाहे होने वाली बहू, कितनी भी सुशिक्षित, नौकरी-पेशावाली, स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर हो। दहेज़ की मोटी रक़म वसूल कर भी, लड़के वाले दहेज़-मुक्त विवाह के झूठे दस्तावेज़ पर अभिभावकों से हस्ताक्षर करवा लेते हैं, ताकि भविष्य में लड़की वालों की तरफ़ से दहेज़ उत्पीड़न के केस में बचाव रूपी सुरक्षा कवच बने। भले ही शादी के पहले और बाद चाहे लाख आर्थिक, शारीरिक-मानसिक और बौद्धिक शोषण कर लिया जाए, पर यहाँ ऐसी कोई बात ही नहीं थी।

बिना कुछ कहे-सुने ही लड़की के पिता ने दहेज़ के प्रति अपनी असमर्थता व्यक्त की कि वो अपनी लड़की को शिक्षित करने के अतिरिक्त अब और कुछ नहीं कर सकते हैं।

सुनकर माता-पिता को आश्वस्त करते हुए लड़के वालों ने कहा, "आप व्यर्थ की चिंता त्याग कर सिर्फ़ अपनी बेटी दे दीजिए। हमारे लिए वही पर्याप्त होगा। वैसे भी विवाहोपरांत प्रत्येक आवश्यक सामग्रियों की यथोचित व्यवस्था है हमारे पास।"

बेटे वालों ने उनकी विचारधारा और मजबूरी समझते हुए, मात्र दो जोड़े कपड़े में ही स्वीकार करने की हर बार मनसा ज़ाहिर की, "आपकी लड़की हमारे घर की बहू बन रही है इसके अतिरिक्त, हमारी तरफ़ से कोई माँग नहीं। आप जो भी करें,अपनी क्षमता का विचार करते हुए, ना कि उधारी-कर्ज़ा माँग कर भविष्य के लिए आर्थिक परेशानी उठा करके।"

अपने बजट के हिसाब से लड़के के माता-पिता ने अपनी नज़दीकी जगह से शादी-विवाह की सारी रस्में पूरी करने का विचार व्यक्त किया। तो लड़की के पिता ने कहा, "हमारी एक ही लड़की है। लोग क्या कहेंगे? आस-पड़ोस को पता चलना चाहिए कि उसकी बारात आई है। शादी हो रही है। हमारे शहर में बारात तो आनी ही चाहिए। बस जो भी व्यवस्थागत ख़र्चे होंगे—होटल, खान-पान, ट्रेन-भाड़ा, ज़ेवर-गहने आदि पर वो सब आप कर दीजिएगा। इसके बिना शादी होगी तो लोग क्या कहेंगे?"

ग़ज़ब विचार धारा है? अपनी आर्थिक सीमाओं के परे, महत्त्वपूर्ण हुआ भी तो क्या? लोग क्या कहेंगे?

इसके लिए बेटी के होने वाले ससुराल का चाहे जितना भी अपव्यय करा दो। बेगाने लोग, जिन्हें उनकी बेटी के सुख-दुख से कोई मतलब नहीं; उनकी परवाह के नाम पर, रस्मों-रिवाज़ों के नाम पर भावी ससुराल का चाहे जितना बेड़ा ग़र्क़ किया-कराया जा सके।

वही पैसे सोच-विचार कर भावी जीवन के लिए सदुपयोग रूप में भी किया जा सकता है, परन्तु बेटी का पिता परवाह कर भी रहा है तो किस बात की . . . "लोग क्या कहेंगे"?

बेटे की ख़ुशी के लिए चलो वो भी सही। बिहारी बहू रूप में होने वाली दुलहन की भावी ससुराल के प्रति सोच-सोच कर हालत पतली रहती है। समाज और परिवार में लड़की, लाख चाहे, झगड़ालू, बदमाश, चण्डी, काली, दुर्गा होने का भ्रम पाले हो। तब भी शान्त पार्वती रूप में ही होने का एकमात्र उपाय बचता है।

शादी और ससुराल, अच्छे-अच्छों को छट्ठी का दूध याद कराने का माध्यम माना जाता है। पर इसके ठीक उलट ये होने वाली बहू, अधिकारपूर्वक समय-समय पर फोन करके अपनी आशा-उम्मीद के हिसाब से मान-मनुहार करती, फ़रमाइशें जताती रहती है,  "माँ ये चाहिए, वो चाहिए। ऐसे होना चाहिए, वैसे होना चाहिए। वो...ये.. मुझे कब दिला रहीं हैं?"

होने वाले सास-ससुर भावपूर्ण यह सोच कर स्वेच्छा से स्वीकार करते हैं कि किसी की बेटी का उद्धार कर रहें हैं हम। हमारे बेटे की ख़ुशी जुड़ी हुई है इससे। इससे ज़्यादा हमें और क्या चाहिए?

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

......गिलहरी
|

सारे बच्चों से आगे न दौड़ो तो आँखों के सामने…

...और सत्संग चलता रहा
|

"संत सतगुरु इस धरती पर भगवान हैं। वे…

 जिज्ञासा
|

सुबह-सुबह अख़बार खोलते ही निधन वाले कालम…

 बेशर्म
|

थियेटर से बाहर निकलते ही, पूर्णिमा की नज़र…

टिप्पणियाँ

राजेश रघुवंशी 2021/07/10 05:57 PM

बहुत ही सटीक और यथार्थवादी कहानी आदरणीया जी।बहुत ही कम कहानियों में बेटे वाले परिवार की विवाह जैसी सामाजिक व्यवस्था में मानवीय पहलू का वर्णन होता है।बधाई आपको।

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

स्मृति लेख

सामाजिक आलेख

कहानी

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं