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उम्मीदों के ऊर्जावान कवि : श्री दुर्गा प्रसाद झाला

'जलती रेत पर नंगे पाँव' यह कविता संग्रह श्री दुर्गा प्रसाद झाला का बारहवाँ कविता संग्रह है। 87 वर्ष की उम्र में साहस के साथ उम्मीदों की कविताएँ रचने का काम श्री झाला जी कर रहे हैं। अपने कविता कर्म को लेकर उन्होंने लिखा है कि "हर कर्म जैसे दायित्व बोध से संपन्न होने पर ही सार्थकता पाता है, उसी प्रकार कविता की अर्थवत्ता के लिए भी दायित्व चेतना को अनिवार्य मानता हूँ, अन्यथा वह एक वायवी शब्द या निरर्थक ध्वनि मात्र रह जाएगी, जिसकी ना तो अपनी कोई दिशा होगी और ना वह मानवीय आधार से जुड़ी हुई ही रह सकेगी"।

कविता पर यह भरोसा श्री झाला जी के समूचे लेखन में दृष्टिगत होता है। जब लिखते हैं कि, चल रहा हूँ /जलती रेत पर नंगे पाँव/ एक नदी की खोज में /भरोसा दे रहे हैं पाँव /ज़रूर मिलेगी नदी /आज नहीं तो कल। तब वे अपनी उम्मीद को कभी नहीं छोड़ते । उनकी कविताओं में इसीलिए  साहस का स्वर प्रतिध्वनित होता है। अंधेरे के सामने वे कभी भी समर्पित नहीं होते और लिखते हैं कि, सबसे ज़रूरी है/ वह अंधेरा/ जिससे जूझते हुए तुम्हें/ अपना सूरज उगाना है

उनकी संघर्ष करने की क्षमता ही उन्हें यह लिखने के लिए प्रेरित करती है कि चट्टानों से जूझती/ चींटियाँ चढ़ती जा रही है/ पहुँचने के लिए /पहाड़ के शिखर तक /बड़ी होती जा रही है /चीटियों की कतार/ छोटा होता जा रहा है पहाड़

श्रम को उन्होंने सदैव प्रणाम किया है। उनकी कविताओं में मज़दूर के पसीने की गंध है। वे लिखते हैं कि, कविता में जब आती है /धरती की धूल /शब्द महक उठते हैं

उनका देवता पाषाण नहीं है। वे कहते हैं, मैंने अपने अंदर बैठे/ देवता से कहा/ पाषाण मत बने रहो/ आओ /मेरे श्रम के पसीने में नहाओ/ और मेरे जीवन के खेत में/ फसल से झूमो

उनके प्रतीकों में चिड़िया है, बच्चे हैं, धरती है, नदी है और स्त्री भी नदी की तरह कोमल होकर उनकी कविता में बहती है । स्त्री के प्रति कवि का हृदय बहुत चिंतित भी है और स्त्री की ताक़त को वह पहचानता भी है। तभी तो कवि लिखता है कि वह स्त्री/ मेरे अंधेरे में /मेरी आत्मा की ज्योति है। कहीं पर वह लिखते हैं स्त्री धरती है/ पुरुष/ धरती पर लहलहाता पेड़। या फिर वह इस तरह भी अभिव्यक्त होते हैं, जब भी/ तुम्हारा स्पर्श मिलता है /देह नहीं /आत्मा खिल जाती है

जीवन को अध्यात्म की तरह जीते हुए वह लिखते हैं कि जब आलिंगन में/ बँधते हैं/ करुणा और क्रोध/ एक नए वाल्मीकि के अंतस  से/ छंद के नए-नए झरने/ झरने लगते हैं
उनकी कविता यात्रा अनवरत है। वे लिखते हैं कि मेरी बेचैनी/ मुझे मैं पंख देती है/ जिनसे मैं उड़ान भरता हूँ/ मैं अपने अकेलेपन को/ तुम्हारे अकेलेपन से जोड़ता हूँ/ और एक नई सृष्टि रचता हूँ

उनकी कविताएँ उनकी यादों में चलती रहती हैं। उनकी यादों में शाजापुर है। उनकी यादों में बचपन के दिन है। उनकी यादों में आत्मा का स्पंदन है। कविता रचने का  उनका संघर्ष, प्रेम, स्निग्धता और कोमलता से भरा हुआ है। इसीलिए उन्होंने कविता को गीतों की तरह रचा है।

मनुष्य के भीतर बहती हुई नदी की खोज उनकी कविता में सर्वत्र दिखती है। उनकी कविता में गौरैया की चहचहाहट और बच्चे की खिलखिलाहट सर्वत्र है। प्रेम का यह रंग उनकी कविताओं
को नए आयाम देता है और एक नई ऊर्जा से पाठक को ओतप्रोत कर देता है ।कवि के लेखन की यही सजगता भी है और यही सफलता भी।

सतीश राठी
समीक्षक
आर 451, महालक्ष्मी नगर,
इंदौर 452010

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