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उपलों में गणित

अमेरिका से धीरज का भारत में अपने गाँव लौटना भागो काकी के जीवन में इतनी हलचल मचा देगा, इसका पूर्वानुमान कोई कैसा लगा सकता था? दरअसल, धीरज 
अमेरिका के किसी विश्वविद्यालय में "प्राचीन काल में गणित और उसका मानव सभ्यता के विकास में योगदान" विषय पर पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च फ़ेलोशिप के लिए गया था। 
इस फ़ेलोशिप की अवधि तीन वर्ष थी। तीन वर्ष समाप्त होने के बाद धीरज को लगा कि उसे स्वदेश वापस जाकर "प्राचीन भारत में गणित" विषय पर शोध करना चाहिए। 
धीरज को यह तो मालूम था कि ईसा पूर्व 3300-1300 के समय काल के दौरान भारतीय लोग ईंट निर्माण में गणित का उपयोग किया करते थे।

ख़ैर, एक दिन धीरज जब भागो काकी के मकान के सामने से गुज़र रहा था तो उसकी नज़र मकान की बाजू की दीवार पर चिपके कंडों यानी उपलों पर पड़ी। सोते-जागते
-खाते सिर्फ़ गणित के विषय में सोचने वाले धीरज को दीवार पर थोपे हुए उन उपलों के आकार और उनके बीच की दूरी ने आनन-फानन में शोध का एक रोमांचक विषय थमा 
दिया। धीरज उस वक़्त तो वहाँ नहीं रुका लेकिन शाम को वह भागो काकी से मिलने उनके घर गया। मुलाक़ात के बाद वह घर लौटा तो उसने "उपलों के निर्माण में गणित का 
उपयोग - प्राचीन काल से अब तक" शीर्षक से अपने भावी शोध परियोजना की रूप-रेखा को अंतिम रूप दिया।

बहरहाल, आज सुबह एक ख़बरिया चैनल ने अपनी 'ब्रेकिंग न्यूज़' में बताया कि अमेरिका से कुछ गणितज्ञ भागो काकी से मिलने अगले हफ़्ते तक डॉ० धीरज के गाँव पहुँचेंगे 
और संभव हुआ तो उपलों के निर्माण में छुपे विज्ञान के विभिन्न पक्षों को समझने के लिए "भारत और अमेरिका के बीच एक साझा अध्ययन" की सिफ़ारिश करेंगे ताकि भारत निकट 
भविष्य में वैज्ञानिक और औद्योगिक क्षेत्र में आशातीत प्रगति कर सके। भारत गोबर में ही उलझा रहे - दुनिया के सभी विकसित देश यही तो चाहते हैं।   

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