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उत्तर भारत का जाड़ा

यूँ तो यह कविता 2011 में लिखी थी परंतु 2014 और अब 2015 में जो कोहरे, सूरज के दिखाई न देने से जन जीवन के अस्त-व्यस्त होने की दशा है उस पर ठीक उतरती है। शायद हर बार ही ऐसा जाड़ा पड़ता है पर हम भूल जाते हैं। हालात कमोबेश हर साल एक से ही होते हैं। 2019 व 2020 की दिसम्बर से जो हाड़ कँपाने वाली ठंड पड़ी वह अभी तक डेरा तम्बू डाले पड़ी है। देहली में पारा 0 डिग्री तक चला गया था। जानकार, अख़बार वाले बराबर पिछले सौ साल का लेखा-जोखा प्रस्तुत कर ताल ठोकी कर कह रहे हैं कि ऐसी कँपकँपी वाली सरदी तो सौ साल में भी नहीं पड़ी। पर अभी तो पूरा माघ के दस दिन बाक़ी हैं। उत्तर भारत में ले दे कर दो ही महीने तो जाड़े के हैं, एक पूस दूसरा माघ। इनमें भी जाड़ा न पड़ा तो कब पड़ेगा! 2019 में ऐसी ही ठंड में एक महीने कुम्भ स्नान बिना किसी शिकायत के आनंद पूर्वक मनाया। सर्दी तो इन दो महीनों के आगे पीछे पड़ती ही है। न पड़ने पर भी हंगामा और पड़ने पर भी। इस कविता में यही भाव है। आप भी आनंद लीजिये -

 

दूरदर्शन,  अख़बार सब जगह
ग्लोबल जलवायु परिवर्तन की चर्चा है।
इस बार ख़ूब जाड़ा पड़ेगा,
दिल्ली जम जायेगी,
दिल्ली में पारा शून्य तक जायेगा।
मुझे लगता है दिल्ली जमे या न जमे पर, 
जाम ज़रूर लग जायेगा,
सभी डर रहे हैं कि जाने क्या होगा?
25 दिसंबर 2011 की रात को-
इंडिया गेट पर जश्न का आलम है,
क्यों न हो बड़ा दिन जो ठहरा,
कोई केवल शाल, कोई हल्के –फुलके स्वेटर में,
गुलाबी ठंड का लुत्फ़ उठा रहा है।


दिसंबर बीत चला नया दिन भी हो गया,
सबकी ज़ुबान पर है, “अब ठंड–वंड क्या  पड़ेगी?
ओह ये हमारा मौसम विभाग-
जब कहता है ठंड पड़ेगी... कभी पड़ी है क्या?”
(2015 में मौसम विभाग के ठंड के बारे में अनुमान ठीक ही हैं,
कभी-कभी ऐसा हो जाता है)
टीका टिप्पणियों का बाज़ार गर्म था,
तभी दिल्ली सर्द हवाओं  के चपेट में आ गई,
कोहरे से यातायात ठप्प पड़ गया।
पश्चिमी विक्षोभ ने ग़ज़ब ढाया,
दिल्ली में पारा लुढ़क कर 2 डिग्री पर पहुँचा,
चंडीगढ़ में पारा शून्य (सुन्न) हो गया।


अरे! बनारस में पारा 3 तक पहुँच गया,
पूर्वांचंल कठुआया, हाड़ काँपने लगा।
बीकानेर, राजस्थान में पत्तों पर बर्फ़ जम गई,
माउंटआबू में पानी जमा।
शिमला में 20 साल बाद बर्फ़ जमी,
श्रीनगर की डल झील बर्फ़ के आग़ोश में
शिकारे वालों को रोज़ी-रोटी के लाले पड़े हैं।
सरकार ने अलाव अभी तक नहीं जलाये,
रैनबसेरों पर ताला लटका है,
ग़रीब कूड़ा-करकट जलाकर हाथ ताप रहे हैं,
जैसे-तैसे बसर कर रहे हैं।
बिजली रानी 12-14 घंटे नदारद,
ट्रेन, बस, हवाई सेवा, 
सब लेट लतीफ़ हो गये,
किसी की कोई सूचना ख़बर नहीं,
यात्री परेशान, टाईम टेबिल खटाई में पड़ गया।
सैलानियों में बर्फ़ देखने का चाव हुआ,
पर रास्ते बंद हैं,
कहीं कोहरा, कहीं पाला,
कहीं भूस्खलन, तो कहीं –
बर्फ़ की परत दर परत,
रुबी (धोबिन की बेटी) को नानी की पड़ी है, “नानी ई जाड़ा न झेल पइयें”,
पिताजी की चिट्ठी आई है-
माँ के लिये ये जाड़ा भारी है,
दीदी का ठंड से हाड़ काँप रहा है।
हीटर अलाव, अगींठी सब नाकाम हैं,
सर्दी का सर्द कहर बरपा है,
शीतलहरी कितनों को लील गई।
सरकार ने नाकामियों परपर्दा डाला,
स्कूल मकर सक्रान्ति तक बंद कर दिये
(इस बार तो हद हो गई, स्कूल 26 जनवरी तक बंद रहे)

उफ़्फ़ ये भी कोइ बात हुई —
गर्मी-सर्दी, बरसात सभी में मौत नाचते चली आती है,
कभी तांडव, कभी आ जा नच ले, 
कभी डांस इंडिया डांस,
झलक दिखला जा, डी.आई.डी की डबल दहशत, 
समय के मंच पर मौसम की थाप पर, 
काल भी क्या खूब थिरकता, रोता, गाता है।
उत्तर भारत जाड़े में ठिठुरता है,
गर्मी में झुलसता है,
वर्षा में डूबता तैरता है,
बंसत के नाम पर पतझड़ झेलता है,
उफ़्फ़ ये समशितोषण जलवायु,
तुझे शत शत नमन।

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