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वाह रे सृष्टि तेरा रूप कैसा?

वाह रे सृष्टि
तेरा कैसा रूप देखा?
दुनिया ने माना अभिशाप
मैंने तो धरती का रूप अब सजते देखा ॥1॥

 

तरस गए थे
बचपन से यौवन तक
घर के मुँडेर पे 
आज फिर से
पंछियों को चहचहाते देखा ॥2॥

 

खो गया था,
डिजिटल दुनिया में
कहाँ बचा था
समय परिवारों में
हम तो यूँ ही 
रिश्ते निभाना
भूल गए थे
ओर आज
पतियों को भी
घर के कामों में 
हाथ बँटाते देखा ॥3॥

 

खेल पुराने
आँखों पे पट्टी
तोता उड़, मैना उड़
जाने कहाँ छूट गए थे
आज फिर
चारदीवारी में
इनको ताज़ा होते देखा ॥4॥

 

अप्रैल की भरी दुपहरी
झुलस पड़ते थे
ए.सी. कूलर भी
सूरज के इस
भीषण ताप में
अब प्रकृति के 
इस नवरूप में
सूरज का
शीतल ताप देखा ॥5॥

 

धूल कंकड़, गाड़ी मोटर
सन जाता था माटी-पुतला
हमारी नादानी से 
दूषित था कोना-कोना
अब प्रदूषण का स्तर 
साफ़ होते देखा ॥6॥

 

जाने कितने छेद किये थे
भारत माँ की छाती पे
धरती माँ सह लेती हँसकर
हर दर्द, बयां कैसे करती?
ये कोरोना विपदा नहीं
हमने भारत माँ के ज़ख़्मों को
हरा होते देखा है
मनवा सँभल ख़ुदगर्ज़ी पर
मनमानी बड़ी भारी होगी
अभी तो ये बस अँगड़ाई है
बाद प्रलय की खाई होगी ॥7॥

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