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वरदान (डॉ. दीप्ति गुप्ता)

ईश्वर के दरबार में एक बार धरती से लाए गए व्यक्ति से जब जवाब तलब किया गया तो, उसके उत्तर सुनकर ईश्वर स्वयं वरदान बनकर उस पर न्यौछावर होने को कुछ इस तरह तैयार हो गया -

ईश्वर ने पूछा - धरती पर तुमने क्या किया
मानव - धर्म
- क्या दिया
- प्यार
- क्या लिया
- दर्द
- क्या बटोरा
- नेकी
- क्या बाँटा
- दूसरों का दुख
- क्या तोड़ा
- दुर्भाव
- क्या जोड़ा
- सद्‌भाव
- क्या मिटाया
- द्वेष
- क्या कायम किया
- शान्ति
- क्या खोया
- बुराई
- क्या पाया
- भलाई
- तुम्हारी जमा पूँजी
- इंसानियत

ईश्वर को लगा यह ज़रूर कोई संत या फक्क़ड साधु होगा, लोगों को प्रवचन देता होगा -

पूछा - करते क्या हो ?
मानव - लेखक हूँ
- लेखक ?
- जी ।
जानते हो ऐसे भारी - भारी काम कितने कठिन है ?
- जी आसान है !
ऐसी कौन सी जादू की छड़ी रखते हो तुम ?
- जी छोटी सी कलम !
- छोटी सी कलम !
-जी उसी में है इतना दम !
- झूठ
- जी सच
- उसे कैसे चलाते हो
- स्याही में डुबोकर काग़ज़ पर चलाता हूँ ।
- उससे क्या होता है ?
- बड़े - बड़े हृदय परिवर्तन, बड़े- बड़े जीवन परिवर्तन, दिशा परिवर्तन, यहाँ - तक कि बड़ी - बड़ी क्रान्तियाँ
- क्या कहते हो, क्रान्ति तो तलवार और कटार की धार पर होती हैं,

- जी, पर क़लम इन सब से पैनी होती है।
- सोए को जगाती है, निराश को उठाती है,
          उदास को हँसाती है, दमित को दम देती है,
               नासमझ को समझाती है, क्रूर को कोमल बना
                   प्यार का पाठ पढ़ाती है, जीवन की परतें खोल
                          गहरे अर्थों का परिचय कराती है,
क्या कहूँ, क्या - क्या न कहूँ
          यह अनोखी सबसे है
               वेद, क़ुरान, बाइबिल, सब इसी के दम से है !
               सच कहता हूँ मेरे भगवन, मैं भी इसी के दम पर लेखक हूँ
       इसी से क,ख,ग ध्वनियों को, शब्दों में ढालता हूँ
अर्थों से भरता हूँ और वे ज़रूरी काम करके
          समाज और जीवन के प्रति, अपना दायित्व निबाहता हूँ
                      जिन्हें सुनकर आप हैरान हैं !!

सृष्टा ने ऐसे दृष्टा को वरदान देते हुए कहा -

तो ठीक है आज के बाद, जब भी मुझे धरती पर
कुछ परिवर्तन लाना होगा, मैं तुम्हारी क़लम में उतर आऊँगा,
तुम्हारी क़लम को दिव्य और धरती को स्वर्ग बनाऊँगा ,

लेखक बोला - और मैं धन्य हो जाऊँगा !!

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