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विज्ञान दिवस

पिछले साल का वाक़या है। उस दिन विज्ञान दिवस था और निदेशक ने मुख्य अतिथि के सामने उन्हें भाषण देने के लिए चुना था। वजह भी थी। उनका भाषण बेहद प्रभावी और ज्ञानवर्धक होता है। पूरी प्रयोगशाला में उनसे बेहतर वक्ता नहीं है।

ख़ैर, उन्होंने तय किया कि वे इटली के प्रसिद्ध वैज्ञानिक गैलीलियो गैलिली पर बोलेंगे। वही गैलीलियो जिन्हें अपने विचारों के लिए वर्षों तक नज़रबंद किया गया था लेकिन जो जीवनपर्यंत अपने विचारों पर डटे रहे।

बहरहाल, जैसा अनुमान था, उनका भाषण बेहद प्रभावशाली रहा। वे श्रोताओं को समझा रहे थे कि वैज्ञानिक कभी किसी के दबाव में काम नहीं करते। उन्होंने अपने भाषण में इस बात का भी उल्लेख किया कि कैसे पंडित नेहरू ने स्वतंत्रता के बाद सर्वाधिक ज़ोर देश में वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं का जाल बिछाने पर दिया।

वे मंच से उतरे तो मुख्य अतिथि ने उन्हें इशारे से पास बुलाया। उन्हें उम्मीद थी कि नेता जी उनको शाबाशी देंगे। जब वे क़रीब पहुँचे तो नेता जी उनसे बोले, “नेहरू का उल्लेख करने की कोई ज़रूरत नहीं; आगे से ध्यान रखना।”

यह सुनते ही वे तपाक से बोले, “ग़लती हो गई सर! अब ऐसा कभी नहीं होगा।” 

उनके भीतर बैठा गैलीलियो मामूली सा झटका बर्दाश्त न कर पाया था। 

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