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विसर्जन

शाम के 7 बजकर 40 मिनट हो रहे थे। स्निग्धा रोज़ की तरह अपने रसोई के कार्य में व्यस्त थी। बीच-बीच में खिड़की से गणपति के निमज्जन में मग्न कॉलोनी वालों के उत्साह को देख लेती थी। उसके विवाह के तीसरे साल में ही उसके पति निकेत की सड़क दुर्घटना में मृत्यु होने के बाद ससुराल वालों ने उसे घर से निकाल दिया था। अपने शांत स्वभाव के कारण वह अदालत के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती थी। अतः अपनी दो साल की बच्ची रीतिका को लेकर मायके चली आयी। मायके में माँ थी, पिता तो सेना में जवान थे, वे फक्कड़पन में नौकरी से इस्तीफ़ा दिए बिना ही संन्यासी बन गए थे। ऐसे में वह माँ को परेशान नहीं करना चाहती थी, वह जल्दी ही अपने लिए नौकरी ढूँढ़कर माँ के घर के पास ही किराये के मकान में रहने के लिए सोच रही थी ताकि रीतिका को किसी आया के भरोसे न छोड़ना पड़े। स्निग्धा के दोनों भाइयों को अपनी बड़ी बहन का मायके में कुछ दिन ठहरना भार प्रतीत होने लगा था। ऐसी स्थिति में स्निग्धा ने अपने लिए जल्दी ही निजी विद्यालय में एडमिन की नौकरी ढूँढ़ ली। पति की असामयिक मृत्यु ने उसे जीवन का नया पाठ पढ़ाया। उसके लिए ख़ून के रिश्ते तथा दुनिया के रिश्तों के मायने बदल चुके थे। अब वह किराये के मकान में रह रही थी। उसकी एक बेटी थी रीतिका, जिससे उसके जीवन की डोर बँधी हुई थी। शाम का भोजन बनाकर वह रसोई के छोटे–मोटे काम समेट रही थी। खिड़की से आने वाली आवाज़ की ओर भी बीच-बीच में देखती जा रही थी। 

बप्पा मोरिया . . . गणपति बप्पा मोरिया . . . 

"मम्मा . . . मम्मा . . ."

"हाँ . . . "

"मम्मा . . . "

"हाँ, बोलो भी, क्या है? कब से मम्मा, मम्मा की रट लगा रही हो। बेटे देख नहीं रही हो कि इतना शोर हो रहा है, उसमें तुम भी चिल्ला रही हो।" अचानक स्निग्धा की नज़र रीतिका के चेहरे पर पड़ी तो वह अपना काम छोड़कर उसके नज़दीक आकर खड़ी गई। तभी रीतिका भारी आवाज़ में कहने लगी, "माँ! ये लोग कितने ख़ुश होकर गणपति बप्पा का विसर्जन कर रहे हैं," थोड़ी देर मौन रहकर उसने फिर से बोलना शुरू किया, "पता है मम्मा, जब उस दिन कॉलोनी वाले अंकल जी हमारे गणपति का विसर्जन करने के लिए बप्पा को बाल्टी में रख कर कुँए में डाल रहे थे, तो मेरा कलेजा मुँह को आने लगा था, मुझसे तो देखा ही नहीं जा रहा था, बहुत रोना आ रहा था। और एक ये लोग हैं कि डीजे लगाकर नाचते हुए बप्पा को विसर्जन के लिए ले जा रहे हैं।"

"हाँ बेटा, वे सब तुम्हारी तरह नहीं सोचते न," स्निग्धा ने सोचा कि जीवन-मरण के दर्शन को बेटी को समझाए, लेकिन घर के काम ख़त्म करके कार्यालय के कुछेक कार्य पूरा करने थे। इसलिए वे अपना काम समेटने लगी।

रीतिका ने फिर कहा, "मम्मा, आपसे कुछ बात करनी है . . . "

स्निग्धा ने पूछा, "बोलो न बेटे . . . "

रीतिका ने कहा, "नहीं, छत पर चलो तो बोलूँ।" 

स्निग्धा ने फिर कहा, "यहीं बोलो न, कोई भी तो नहीं है यहाँ पर।" 

रीतिका ने सहमती-सी हुई बोली, "नहीं मम्मा, प्लीज़ . . ."

स्निग्धा ने रीतिका को देखकर उसकी बात को मानना ही सही समझा, "अच्छा ठीक है," कहकर वह रीतिका के पीछे-पीछे छत पर पहुँच गयी। स्निग्धा ने पहली बार बेटी को इस तरह हिचकिचाते हुए देखा था। पन्द्रह साल की रीतिका से वह सभी विषयों पर खुल कर बात करती थी। दुनिया से डरकर नहीं, बल्कि दुनिया को समझकर जीने की सीख देती रहती थी। फिर आज ऐसे बात करते देख वह भी एक पल के लिए सहम गयी थी। उसने अपने भय का भाव छिपाते हुए हुए पूछा, "बोलो बेटा क्या कहने के लिए तुम्हें इतना सोचना पड़ रहा है?"
 
रीतिका ने माँ का पुराना फोन हाथ में लिया था। उसे ही एक हाथ से दूसरे हाथ में घुमाती और रखती हुई बोली, "मम्मा, पहले ये बोलो कि आप मेरे बारे में ग़लत तो नहीं सोचोगी न?" 

स्निग्धा के मन पर संदेह के बादल छाने लगे, "नहीं बेटा, मेरा दिल बैठा जा रहा है। बोलो, क्या बोलना है।" 

रीतिका के चेहरे का रंग उड़ रहा था, "मम्मा, पहले प्रोमिस करो आप कि मेरे बारे में कुछ ग़लत तो नहीं सोचोगी। ये मेरी आख़िरी ग़लती है प्लीज़। इसके बाद ऐसा कुछ भी नहीं है, जो मैंने आपसे शेयर न किया हो।" 

स्निग्धा के धैर्य का बाँध अब टूटने लगा था। वह अपने पति निकेत की मृत्यु के बाद बड़ी मुश्किल से ख़ुद को सम्भाल पाई थी। उसे लगता था कि निकेत शायद बहुत अधिक अच्छे थे इसलिए ईश्वर ने उन्हें अपने पास बुला लिया था। व्यापार से होने वाली आय का एक बड़ा भाग तो वह अनाथालय में हर माह स्निग्धा के साथ जाकर दे आते थे। जब रीतिका का जन्म हुआ था तो अनाथाश्रम के सारे बच्चों को उनके पसंद का भोजन कराते हुए सबको वस्त्र उपहार में बाँटे थे। पति-पत्नी के रागात्मक संबंधों को देख कर उसकी दोनों जेठानियाँ कुढ़ती रहती थीं। कुढ़ने का कारण स्पष्ट था कि वे गहने, वस्त्र, वाहन आदि से लदी रहतीं, किन्तु पति से शिकायतों का सिलसिला ख़त्म नहीं होता था दोनों का। स्निग्धा को अचानक निकेत की बहुत कमी महसूस होने लगी थी इस पल। ख़ुद को सहेजते हुए वह रीतिका की बातें सुनने लगी। 

रीतिका ने बताया कि जब वह सातवीं कक्षा में पढ़ रही थी तो एक बार स्कूल जाते समय एक लड़के से उसका हाथ टच हो गया था, इसके बाद पाँच-छह दिनों तक ऐसा होता रहा। उस समय उसे भी उसके हाथों का टच होना और उसकी ओर देखना बहुत अच्छा लगता था। इसके बाद लड़के ने जब अपने प्यार का इज़हार किया तो उसने भी हाँ बोल दिया। इसके बाद तो बस ऐसे ही दो सालों तक चला। फिर जब परीक्षा से पहले ग्रुप स्टडी के लिए रिया के घर गयी तो उसकी शॉप सामने ही थी, "वह मुझे वहीं से देखता रहता। गर्मी की छुट्टियों में मैं उसे बहुत मिस कर रही थी तो एक बार आपके इस फोन में मैंने उसका फोटो खींच लिया था।" 

स्निग्धा ने चैन की साँस ली, "बेटा, इतना कुछ हो गया, तुमने मुझसे कुछ नहीं बताया। मैं तुमसे हर बात शेयर करती हूँ। फिर मुझ पर अविश्वास क्यों? तुमने अपना फोन नम्बर तो नहीं दिया न?" 

रीतिका भी माँ को सच बताने के बाद सहज अनुभव कर रही थी, "नहीं मम्मा, मैं न्यूज़ पेपर और टीवी में देखती रहती हूँ, सारे प्रॉब्लम फोन से ही शुरू होते हैं। इसलिए मैंने कोई नंबर नहीं दिया और न ही उसका लिया। मम्मी, आप फ़्रैंक होने के साथ-साथ डाँटती भी बहुत हैं, इसलिए मैं आपसे डरती थी। मुझे हिम्मत ही नहीं होती थी कि आपसे ये सब शेयर करूँ। और आप भी तो हमेशा पढ़ने-पढ़ने की बात करती थीं। ये तो आप पहली बार लॉकडाउन की वज़ह से मेरे साथ पाँच महीने से हो तो . . . " इतना कहते-कहते रीतिका ख़ुद को सम्भाल न पायी और रोते-रोते ज़मीन पर बैठ गयी। 

स्निग्धा किसी तरह उसे उठाकर एक ओर दीवार के सहारे खड़ी करके उसे चुप कराने लगी। लेकिन बड़ी होती हुई बेटी की मनःस्थिति देखकर उसे समझाने के साथ ही मन किसी भावी अनिष्ट की आशंका से डूबा जा रहा था। उसने किसी तरह अपने डूबते मन को सँभाला और बेटी के माथे पर चुम्बन अंकित करते हुए अपने सीने से चिपटाकर उसे दुनियादारी की बातें समझाने लगी। किशोर उम्र के कारण शरीर की रासायनिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप होने वाले आकर्षण के बारे में विस्तार से समझाने लगी। अब तक लगभग रीतिका सँभल चुकी थी, केवल बीच-बीच में उसकी हिचकियाँ उठ रही थीं। स्निग्धा ने भी सोचा कि चलो कुछ अनहोनी होने से पहले ही रीतिका के उफनते प्रेम का विसर्जन बप्पा के साथ ही हो रहा था। 

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