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वो (दीप्ति शर्मा)

एकांत में एकदम चुप
काँपते ठंडे पड़े हाथों को
आपस की रगड़ से गरम करती
वो शांत है
ना भूख है
ना प्यास है
बस बैठी है
उड़ते पंछियों को देखती
घास को छूती
तो कभी सहलाती
और कभी उखाड़ती है
जिस पर वो बैठी है
उसी बग़ीचे में
जहाँ के फूलों से प्यार है
पर वो फूल सूख रहे हैं
धीरे धीरे फीके पड़ रहे हैं
उनके साथ बैठकर
जो डर जाता रहा
अकेलेपन का
अब फिर वो हावी हो रहा है
इन फूलों के खतम होने के साथ
ये डर भी बढ़ रहा है
फिर कैसे सँभाल पाएगी
वो इन काँपते हाथों को,
लड़खड़ाते पैरों को
इन ठंडे पड़े हाथों की रगड़ भी
फिर गरमी नहीं दे पाएगी
वो भी मुरझा जायेगी
इन फूलों के साथ।

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