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वृद्धावस्था तथा अकेलापन

वृद्धावस्था तथा अकेलापन, दोनों विषयों के ऊपर बहुत कुछ लिखा जा चुका है व लिखा जा रहा है| सम्भवतः इसलिये कि आजकल यह विषय किसी न किसी रूप में हम सबके सामने है। प्रतिदिन ही अख़बारों में व अन्य किसी न किसी माध्यम से इस ओर हमारा ध्यान चला ही जाता है।

या तो हम स्वयं या माता पिता या कोई न कोई परिचित इस स्थिति में है तथा आँकड़ों के अनुसार यह समस्या बढ़ती जा रही है। इस समय संसार की लगभग आठ प्रतिशत से भी अधिक संख्या ६५ वर्ष से अधिक लोगों की है तथा तीव्र गति से बढ़ रही है। 

बढ़ती आयु के साथ-साथ और भी अनेक समस्याएँ सामने आती हैं। यदि काम से अवकाश हो जाये तो आर्थिक कठिनाइयाँ सामने आ जाती हैं। बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों की भी कमी नहीं रहती जिनके कारण आवागमन, मित्रों से आचार-विचार कम होने लगता है। तथा न चाहते हुए भी अकेलेपन का सामना करना ही पड़ता है। 

अकेलापन, यूँ तो समाज के सभी सदस्यों में होता है व हो सकता है परन्तु समाज के वयोवृद्ध सदस्यों में बहुधा देखा गया है। ऊपर लिखी कठिनाइयाँ इस अकेलेपन का कारण हो सकती हैं। 

एक उदाहरण यहाँ देना चाहूँगी। बहुत समय से, संध्या समय मुझे घूमने जाने की आदत है व लगभग प्रति दिन ही जाती हूँ। 

एक शाम घूमने जाते हुये, कुछ ही देर बाद देखा कि एक महिला अपने घर के आगे खड़ी थीं, मुझे देखते ही वह आगे बढ़ीं और हलो के बाद पूछा कि मैं घूमने जा रही हूँ क्या? मैंने हाँ कहा व उनसे पूछा कि आप चलेंगीं क्या? वह ख़ुश होकर साथ चल पड़ीं। अपने जीवन की अनेक बातें बताती रहीं, मानो उन्हें किसी सुनने वाले की प्रतीक्षा ही थी। हम दोनों प्रतिदिन साथ घूमने के लिए जाने लगे। 

कुछ दिन बाद वह बोलीं कि वह अपने भगवान से रोज़ प्रार्थना करती थीं कि उन्हें कोई बात करने वाला मिल जाये (ये महिला इटैलियन है) जिससे वे बात कर सकें। और बताया कि मैं उनकी प्रार्थना का उत्तर हूँ। 

ऐसे अनेक उदाहरण हम सबके जीवन में मिलेंगे जहाँ हमारे प्रियजन, मित्र, सम्बंधी अकेलेपन का सामना करते हुए मिलेंगे- किसी न किसी की प्रतीक्षा करते हुए, अपना अकेलापन साँझा करने के लिए। 

अकेलेपन की समस्या सदा ही  इतनी अहम रही है... कहा नहीं जा सकता।

आधुनिक समय के बदलाव को देखते हुये यह भी समझ में आता है कि हमारे माता-पिता की पीढ़ी संयुक्त परिवार मे अधिकतर रहती थी। बड़े-बूढ़ों को सम्मान से रहने का व छोटे सदस्यों की देखभाल करने का, शिक्षित करने का अवसर मिलता रहता था। अकेलापन महसूस कम ही होता था। 

समय के बदलाव के कारण परिवार छोटे होते गये, बच्चे अलग रहने लगे, दूरियाँ बढ़ती गईं, कुछ तो परिस्थितियों के कारण, कुछ बदलती सोच के कारण व बहुत कुछ आर्थिक कारणों से भी। 

समाचारों के अनुसार यह समस्या भारत में ही नहीं वरन्‌ अन्य देशों में भी बढ़ रही है, तथा विभिन्न प्रकार के उपाय, सरकार तथा प्राईवेट संस्थाएँ उनके समाधान खोज करने में लगी हैं। कहीं-कहीं तो एसे विभाग भी खोले हैं जहाँ केवल अकेलेपन का निदान कैसे हो, इसी समस्या पर ध्यान दिया जा रहा है। 

कहीं कहीं यह भी देखने में आता है कि वृद्ध स्त्रियाँ व पुरुष प्रसन्न भी हैं, उन्होंने स्वयं ही अपने अकेलेपन से जूझने के उपाय निकाल लिये हैं। आपस में मिलते-जुलते हैं, बातचीत करते हैं, साथ में मिल कर इधर-उधर, आसपास या दूर घूमने आदि जाते हैं।

चिकित्सा विज्ञान में इतनी उन्नति हुई है, जिसके कारण बीमारियाँ भी कम हुई हैं। नये-नये इलाज भी निकल रहे हैं, परिणाम स्वरूप आयु-काल बढ़ रहा है। ९०- १०० वर्ष का जीवनकाल बहुधा सुनने में आता है। 

इसी विषय में मैंने अपने कुछ आयु प्राप्त संबंधियों से भी बातचीत की। 

मेरी बुआ जो ९० वर्ष की हैं, ऊँचे विचारों की हैं। कठिनाइयों से हार न मानना ही उनका ध्येय रहा है। उनका मानना है कि अपने शरीर व मन को बाँधना, मन पर अधिकार रखना, अर्थात दिनचर्या में ईश्वर का स्थान रखना, अपने लिये ही नहीं दूसरों के लिये भी करना, समस्याओं का हल निकालते रहना व सदा अपने को सकारात्मक रखना उनके लिये सहायक रहा है। 

यदि हम अपने-अपने अतीत में देखें, तो पायेंगे कि हमारी दादी-नानी, घर का काम करें न करें परन्तु वे सिलाई-बुनाई व पूजा-पाठ में अपना समय व्यतीत करती थीं। पुरुषगण घूमने, पढ़ने या बच्चों में व्यस्त रहते थे। अकेलेपन को पास फटकते भी डर लगता होगा। 

कहा गया है कि यद्यपि डिप्रेशन और अकेलापन अलग है, फिर भी यदि अकेलापन गहरा होता जाये तथा उसे दूर करने के उपाय न प्रयोग किये जायें तो अकेलापन डिप्रेशन में बदल सकता है, जो कि एक बीमारी में भी बदल सकता है। 

आइये, कुछ एसे उपाय देखें जो प्रयोग में लाये गये हैं व आज भी लाभदायक हैं। 

आप सब निःसन्देह हमारे समाज के ऐसे सदस्यों को जानते होंगे, जिनके जीवन में यह सब समय बिताने के साधन हैं, तथा वे अकेलापन दूर करने में भी सफल हैं। 

कढ़ाई बुनाई सिलाई आदि। मेरी नानी जहाँ भी जाती थीं, पुराने कपड़े, बुने हुये सवैटर आदि निकलवा लेती थीं। नया न मिलने पर, पुरानी चीज़ों का प्रयोग नया बनाने के लिये करती थीं। 

आध्यात्मिक बातें। हमारा साहित्य इतनी सुन्दर शिक्षाओं, कहानियों से भरा हुआ है। कम शिक्षा प्राप्त स्त्री-पुरुष भी स्वयं अपने लिये व अपने या पड़ोस के बच्चों को सिखाने पढ़ाने में समय व्यतीत कर सकते हैं। बच्चों को तो कहानियों का शौक़ होता ही है, हमारे समाज के बड़े सदस्य भी पुरानी शिक्षातमक तथा जग-बीती कहानियाँ पसन्द करते हैं। यदि वे प्रयत्न करें तो स्वयं अपने जीवन के विषयों पर ही, लिख भी सकते हैं जो रुचिकर तो होगा ही, छोटे सदस्यों के लिये एक पाठ भी होगा। 

नित्य घर से बाहर अवश्य निकलें। ताज़ी हवा व हरियाली का मन व मस्तिष्क पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। ऐसा बहुत सीनियरजन करते व सिखाते हैं। चीन व जापान के लोग घर से बाहर निकल कर पार्क या खुले मैदान में ध्यान या हास्य योग करते हैं। 

घर के नियमों के अनुसार कुछ छोटा काम किया जा सकता है। मेरे श्वसुर धुले कपड़े तहाने व धुले बर्तन अलमारी में रखने का काम ख़ुश हो कर करते थे। 

पढ़ने में रुचि सबकी नहीं होती परन्तु बाग़बानी, संगीत, जो भी मन को भाये व्यस्त रखने के अच्छे साधन हैं। 

जो भी साधन अपनायें, अकेलेपन को हावी न होने दें, मन की गहराइयों तक ना पहुँचने दें। 

नये लोगों से मिलें, जहाँ तक हो आमने-सामने, टीवी भी साथ बैठ कर देखने में अच्छा लगता है। मिलने का समय न हो तो फ़ोन पर ही बातचीत करने से भी अच्छा समय निकल जाता है। 

मेरा विश्वास है कि और भी अनेक उपाय होंगे जो हम सब भी तथा हमारे चारों ओर बहुत लोग प्रयोग में लाते हैं बस उन्हें ढूँढ़ना है। 

सोचिये !
 

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