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याद (विमला भंडारी)

रोटी जो दूर ले जाती है
ख़ुशबू उनकी लौट आती है
कुछ सफेद बुगलों की तरह
उतर आये मेरे घर की छत पर
सुनाने लगे अपनी
छोटी-छोटी कविताएँ
फूलों की, पानी की
टीलों की, नानी की
कुछ परीकथाएँ भी ले आये थे
संग अपने
खूब हिल हिलकर गुंजार रहे
सब मिलकर
कुछ दिनों की ही तो बात है
थोड़ा जी बहल जायेगा
फिर मौसम बदल जायेगा
कुछ न साथ आयेगा
हवाओं का रुख बदल जायेगा
आओ, लौट आओ फिर
रूखी-सूखी खा लेंगे
जीवन यूँ ही कट जायेगा


 

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