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यमराज, चित्रगुप्त और हिन्दुस्तानी

आत्मा एक मनुष्य की ले चले यमराज,
बैठे जहाँ चित्रगुप्त थे लेकर अपने साज;
देखकर मृतात्मा चित्रगुप्तजी
पहले तो झुँझलाये,
फिर अलसाये….
चाय की चुस्की लेकर
चपरासी पर चिल्लाये –

 

"बैठे रहते हो दिनभर,
कुछ काम नहीं हो करते,
रोज़ नई माँगे लाते हो, 
स्ट्राइक से नहीं डरते.
मुँह क्या तकते हो मेरा तुम,
लेजर इसका लाओ,
पाप-पुण्य का हिसाब है करना, 
जल्दी से तुम जाओ।"

 

चपरासी लेजर ले आया,
चित्रगुप्त ने चश्मा लगाया;
मृतात्मा का खाता जो देखा,
उनको कुछ समझ न आया।

 

झाँक के अपनी ऐनक से देखा,
ऊपर से नीचे तक देखा;
मस्तक पर उभरी एक रेखा,
पाप-पुण्य का किया जो लेखा
कहने लगे –
"क्या कहूँ मैं इसकी,
बात नहीं कोई कहने जैसी;
पाप-पुण्य कुछ नहीं खाते में,
बेलेंस निल है बही खाते में!"

 

बात सुनी जब गहरी सोच में
डूब गये यमराज,
कहने लगे-
"क्या यह संभव है
जीवन में महाराज?
क्या ये कोई संत है, पीर, 
फ़क़ीर या ज्ञानी?"

 

"नहीं," कहा चित्रगुप्त ने;
"यह है हिन्दुस्तानी!
पाप-पुण्य की फ़िक्र ये करता,
जो होता फोरटी-नाइन में, (१९४९)
जीवन तो सारा कट गया इसका,
राशन की लाइन में;
आलू-प्याज़ के चक्कर में
ये फिरा है मारा मारा;
नोन-तेल के चक्कर में
ये जीवन से है हारा।
तुम ही कहो कहाँ भेजें
इसको, स्वर्ग या कि नर्क?
समझ नहीं पाया ये
अब तक, इन दोनो में फ़र्क!"

 

"स्वर्ग-नर्क की बातें छोड़ो,"
कहने लगे यमराज;
"ये लायक़ है उसी देश के,
जहाँ भ्रष्टाचार का राज।
सितम सहना और
कुछ भी न कहना,
बनी जहाँ की पहचान
भारत वाली क्यु में लगा दो
इस को भी भगवान!"

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