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पाराशर गौड़

जन्मस्थली : मिरचोडा असवालस्यूँ पौडी गढ़वाल उतराचंल ।
साहित्यिक कार्यक्षेत्र : मूलत: गढ़वाली मे लिखा। कविता, गीत, नाटक व फिल्म के माध्यम से गढ़वाली भाषा का प्रचार व प्रसार किया। 60 के दशक में 30 से अधिक गीत दिल्ली के आकाशवाणी से प्रसारित हुए।
गढ़वाली में पहली बार अनेक अंकों वाले नाटकों का लेखन व मंचन इससे पूर्व एकांकी नाटक ही हुआ करते थे। गढ़वाली मंच पर तब पहली बार महिला कलाकारों को लाने का श्रेय भी। पहली बार राजधानी में पाराशर गौड़ द्वारा लिखित नाटक ’औंसी की रात’ का कुँमाइनी में अनुवाद ’अमुसी की रात’ का मंचन हो कर एक नई शुरूआत।
चलचित्र :  एक प्रयास: सन्‌ 1983 मे प्रथम गढ़वाली फिल्म "जग्वाल" का निर्माण कर उत्तराखंडी एवं उतराचंली सिनेमा के लिए मार्ग खोल कर एक इतिहास रचने का प्रयास। उत्तरप्रदेश के प्रथम चलचित्र समारोह मे विशेष रूप से आमंत्रित व सम्मानित।
प्रकाशन व मंच :  अब तक:- लगभग 100 से अधिक गढ़वाली गीतों की रचना। 400 से अधिक कविताओं की रचना जिनमें से अधिकतर समाचार पत्र व पत्रिकाओं में प्रकाशित। 60 के दशक में बहुचर्चित कलाकार के रूप में पहिचान। 50 से ऊपर गढ़वाली नाटक में अभिनय तथा लगभग सभी में र्निदेशन भी। हिन्दी में भी अभिनय जिनमें बहुचर्चित नाटक "एक और द्रोणाचार्य", "किस्सा कुर्सी का" और "बिना दीवारों का घर" सम्मलित हैं।
सन्‌ 1989 के बाद कैनाडा प्रवास के बाद हिन्दी से जुड़े। हिन्दी में लेखन। टोरान्टो में प्रत्येक हिन्दी कवि सम्मेलन में भाग लिया। एक अच्छे व लोक प्रिय कवि के रूप में चर्चित हैं। साहित्यकुंज, कात्यायनी, अभिव्यक्ति, चेतना आदि में बराबर लेखन। आगामी हिन्दी व गढ़वाली फिल्मों की पटकथा पर काम जोरों पर। कैनडा में "जंगल ला" अंग्रेजी में, "जनून", "एक पल", "गरीब बैंक" हिन्दी में; "वतना तो दूर" पंजाबी फिल्मों में अभिनय।
सम्मान : कई उतरांचली व देश विदेश सस्थाओं द्वारा सम्मानित।

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