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प्रिय मित्रो,

पिछले दिनों एक मित्र से बात हो रही थी। उनके कोई लेखक मित्र जो भारत में रहते हैं, प्रकाशन के लिए साहित्य कुञ्ज में कुछ भेजना चाहते हैं। समस्या यह है कि कोरोना काल में वह रचना बाहर जाकर पेशेवर टाइपिस्ट से टाईप करवाने में असमर्थ हैं और अपनी रचना को कभी भी टाईप उन्होंने किया ही नहीं। ऊपर से कठिनाई यह कि वह सारी उम्र अफ़सरी करते रहे हैं। यानी जो टाइपिस्ट ने टाईप कर दिया और हस्ताक्षर करने के लिए सामने रख दिया, उसपर वह हस्ताक्षर करते रहे हैं। उन दिनों प्रूफ़ रीडिंग तक भी उन्होंने नहीं की। कभी-कभी, टाइपिस्ट को सजग रखने के लिए नज़र उठा कर टाइपिस्ट की आँखों में झाँक कर पूछ लिया करते थे - सब ठीक है न। भला टाइपिस्ट कभी कहता कि सर नहीं, कुछ ठीक नहीं है! टाइपिस्ट सिर्फ़ मुंडी हिला देता कि सब कुशल-मंगल है। हस्ताक्षर हो जाते और फ़ाइल आगे बढ़ जाती।

सेवा निवृत्त होने के बाद उम्र-भर की आदत कहाँ जाती! घर में डेस्कटॉप पीसी है - बरसों से है; जिसे वह केवल एक या दो उँगलियों से ही चलाते रहे हैं। कोरोना ने उनके लिए दोहरी मुसीबत खड़ी कर दी है। समय बहुत है अब लिखने के लिए, पर टाईप कैसे हो? जितने समय से हम सब लोग कोरोना को झेल रहे हैं - उतनी देर प्रयास करने से कोई भी टाइपिस्ट बन सकता है। आत्म निर्भर होना ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। परन्तु पुरानी अफ़सरशाही की पुरानी आदतें छोड़ने की प्रवृत्ति भी होनी चाहिए। मैं ऐसे बहुत से लेखकों जानता हूँ जो पिछले वर्ष में स्वयं टाईप करने लगे हैं। उन्होंने मुझे बताया तो नहीं परन्तु अब उनकी पाण्डुलिपियों में वर्तनी की शुद्धता को देखते हुए समझ आ जाता है कि लेखक ने यह स्वयं टाईप किया है। लेखक की तरह प्रत्येक टाइपिस्ट की भी अपनी शब्दावली होती है जो– पाण्डुलिपि में क्या लिखा है, से स्वतंत्र होती है। टाइपिस्ट की उँगलियाँ वैसे ही चलती हैं जैसे वह बोलता है। पाण्डुलिपि टाईप करते हुए टाइपिस्ट पढ़ते हुए बोलता है और जो बोलता है वह टाईप करता है। इसमें अनावश्यक और अनुचित अनुस्वार का प्रयोग (अनुनासिका तो भूल ही जाइए), बोली की (भाषा की) व्याकरण इत्यादि टाइपिस्ट अपनी ओर से पाण्डुलिपि में जोड़ देता है। और इसी तरह की टाईप की हुई प्रति मुझे मिलती है।  कई बार लेखकों को व्यक्तिगत ई-मेल और सम्पादकीयों द्वारा चेता चुका हूँ कि रचना को भेजने से पहले कृपया अपनी रचना को फिर से पढ़ लें। अंततः रचना के लेखक आप हैं, आपका टाइपिस्ट नहीं। अब इस समय में, इस समस्या का कैसे समाधान हो? हस्तलिखित पाण्डुलिपि को टाइपिस्ट तक पहुँचाएँ तो कैसे? समय रहते अगर आधुनिक तकनीकी को, जो आपकी आँखों के आगे आकर बार-बार खड़ी होकर आग्रह करती रही है कि मुझे पूर्णतः अपनाओ, अपना लिया होता तो कम से कम बाहरी जगत के साथ या समय के साथ नाता तो जुड़ा रह सकता था।

कुछ सीमा तक हम सब लोग इस प्रवृत्ति से ग्रस्त हैं – नई तकनीकी या कुछ भी नया सीखने से बचते हैं। यह भी सच है कि एक उम्र के बाद यह चेष्टा करने की क्षमता का गला हम स्वयं घोंट देते हैं। ऐसा हम जान बूझकर नहीं करते अपितु हम अपने बुरे अनुभवों को संगृहीत करते रहते हैं और जिसका उपयोग हम कुछ भी नया सीखने से बचने के लिए करते हैं। यह सच्चाई हर पीढ़ी और हर युग और नई तकनीकी क्रान्ति की है।

पिछले दिनों डॉ. शैलजा सक्सेना से अपने पौत्र युवान की बात कर रहा था कि वह पिछले माह तीन वर्ष का हुआ है और मोबाइल पर गूगल प्ले स्टोर से वर्ड गेम्स डाउनलोड करना सीख चुका है। पढ़ना तो नहीं आता परन्तु अपने अनुभव से सीख चुका है कि किस बटन को दबाने से "मनी" मिलता है और विज्ञापन देखने से हर बार "मनी" मिलता है। यूट्यूब पर जा कर अपनी इच्छा के अनुसार कौन से हिन्दी गाने सुनकर नाचना है। विशेष बात यह है कि उसे किसी ने सिखाया नहीं है - यह प्रकृति प्रदत्त सीखने की क्षमता है जो हर मानव को जन्म से ही मिलती है। इस क्षमता को हम खोते नहीं हैं, पूरे जीवन भर हम उतने ही सक्षम रहते हैं जितना कि एक नवजात बच्चा। सोच कर देखें कि किस तरह से जन्म के बाद, आरम्भिक महीनों में बच्चा क्या कुछ सीख जाता है! क्या हम प्रौढ़ होने के बाद, जीवन के अनुभव का संचयन करने के बाद इस क्षमता को खो देते हैं? नहीं बिलकुल नहीं, बल्कि मेरा तो यह मानना है कि जीवन का अनुभव हमारी शक्ति बन सकता है। फिर ऐसा क्यों है कि हम बड़ी उम्र में कुछ नया नहीं सीखना चाहते, बल्कि पुरानी चीज़ों के साथ एक "रोमांटिक" संबंध बना कर उन्हें छोड़ना नहीं चाहते।

सोचता हूँ तो समझ आता है हर पुरानी पीढ़ी, नई पीढ़ी के सामने बाधाएँ खड़ी आई है ताकि नई पीढ़ी नई तकनीकी को न अपनाए। कम से कम जब तक मैं भारत में था, मैंने यही देखा था। डॉ. शैलजा सक्सेना से बात करते हुए हम हँस रहे थे कि चार-पाँच साल की अवस्था में हम लोग तो तख़्ती पर गाची का लेप करते हुए या स्लेट पर स्लेटी से लिखते हुए माँ की नज़र बचाकर गाची या स्लेटी खाने के चक्कर में रहते थे। यही हमारा मनोरंजन होता था। शैलजा उम्र में मुझ से बहुत छोटी हैं। परन्तु उनका भी वही अनुभव रहा था जो मेरा था। अब जो लिख रहा हूँ वह शैलजा से पहले की समय की बात है। उन दिनों बच्चों को क़लम, दवात (काली स्याही जिसे रोशनाई भी कहते थे) तख़्ती पर लिखना सिखाया जाता था। दूसरी-तीसरी कक्षा में डंक/निब होल्डर से लिखते थे। विषय के अनुसार निब बदलती थी जैसे कि इंग्लिश के लिए ’ज़ेड’ की, हिसाब/गणित के लिए ’आई’ की निब इत्यादि होती थीं। फ़ाउनटेन पेन और पेंसिल के बारे में कहा जाता था  कि इससे "हैंडराइटिंग" ख़राब हो जाता है। स्कूल में अध्यापक फ़ाउनटेन पेन से किया हुआ "घर का काम" स्वीकार नहीं करते थे। याद है मुझे पापा ने फ़ाउनटेन पेन ले दिया था, शायद मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में था, जिसे मुझे स्कूल ले जाने की अनुमति नहीं थी। 

फिर आई तकनीकी क्रान्ति - फ़ाउनटेन पेन की जगह बॉल प्वाइंट ने लेनी आरम्भ की। फिर वही प्रतिबंध लगे। स्कूल में अनुमति नहीं और तो और उन दिनों बैंक वाले भी बॉल प्वाइंट के हस्ताक्षरों को स्वीकार नहीं करते थे। अब हालत यह है कि फ़ाउनटेन पेन आजकल विदेशों में ज्युलरी/ज्वैलरी स्टोर में मिलता है। नई तकनीकी का विरोध करना शायद पीढ़ी दर पीढ़ी मानवीय धर्म रहा है।

अपने ही अनुभव की बात करता हूँ। सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में कैनेडा और यू.एस. में सी.बी. (सिटिज़न बैंड) रेडियो का प्रचलन होने लगा था। हर युवा ड्राइवर अपनी कार में शान से लगवाता और ट्रंक/डिक्की पर एक लम्बा सा एंटीना हवा में झूलता चलता। इस सी.बी. रेडियो की उपयोगिता केवल ट्रक डाईवरों के लिए थी, क्योंकि इसके माध्यम से वह अपने ऑफ़िस से संपर्क में रहते थे या किसी दुर्घटना इत्यादि के समय पुलिस से सहायता माँग सकते थे। युवा लोग इस बैंड का उपयोग केवल  व्यर्थ की बातों के लिए करते थे। परिणाम यह हुआ कि दो-तीन वर्षों के बाद आम कारों में इसका प्रचलन समाप्त हो गया। फिर आया होम-कंप्यूटर का युग। मेरे दोनों बेटों ने ज़िद शुरू की कि वह भी होम कम्प्यूटर चाहते हैं। मेरा प्रश्न था - किस लिए? उनका उत्तर था, स्कूल का काम करने के लिए और "चैटिंग" के लिए। स्कूल का काम तो समझ आया पर "चैटिंग" नहीं। चैटिंग सी.बी. रेडियो पर व्यर्थ की बातचीत का नया अवतार था। हालाँकि मैं स्वयं कम्प्यूटर के क्षेत्र से आया था। इसकी व्यवसायिक उपयोगिता से ही अपनी रोज़ी-रोटी कमाता रहा था। भविष्य के दैनिक जीवन में कम्प्यूटर के प्रभाव को भी समझ सकता था, फिर भी मैं अपने बच्चों के सामने एक बाधा बनकर कुछ समय तक खड़ा रहा। यही कहता रहा "इस कम्प्यूटर का भी वही हाल होने वाला है जो सी.बी. रेडियो का हुआ है"। आज जब मेरे बेटे मुझे दिन रात कम्प्यूटर पर इतना कुछ करते देखते हैं तो हँस कर बार-बार याद दिलाते हैं – "और डैड आपने कहा था कि कम्प्यूटर का हाल भी सी.बी. रेडियो जैसा होगा!"

इस सम्पादकीय में साहित्य कुञ्ज के लेखकों और पाठकों को संबोधित कर रहा हूँ - कृपया नई तकनीकी को अपनाएँ। सोशल मीडिया की सकारात्मक शक्ति का उपयोग करें। प्रत्येक माध्यम का अपना अलग महत्त्व है। उसे समझ कर हर माध्यम का उचित प्रयोग करें। आने वाला युग इस युग से भी अधिक गतिशील होगा। पिछड़ना आसान होगा - चेता रहा हूँ कि इतना भी मत पिछड़ जाएँ कि केवल क्षितिज पर एक बिन्दु बन कर रह जाएँ। समय के साथ क़दम मिला कर बढ़ते रहें। नई तकनीकी आपकी सुविधा के लिए है। इलैक्ट्रॉनिक माध्यम को आप पढ़ने-लिखने के लिए अपना ही चुके हैं (तभी तो आप साहित्य कुञ्ज पढ़ पा रहे हैं) ई-पुस्तक की उपयोगिता को भी समझिए। स्थापित लेखक अभी भी इससे बच रहे हैं। प्रिंट मीडिया के प्रकाशक कभी आपको ई-बुक प्रकाशन के लिए प्रोत्साहित नहीं करेंगे। मैं यह नहीं कहता कि प्रिंट में पुस्तकों का प्रकाशन समाप्त हो जाएगा परन्तु ई-पुस्तक अधिक शक्तिशाली रहेगी। हालाँकि इस समय हिन्दी साहित्य की सत्ता इस माध्यम को अपनाने से आनाकानी कर रही है। पिछले दिनों भारत में हुए विश्वरंग के सम्मेलन में कैनेडा के लेखकों के गद्य और पद्य संकलनों की दो ई-पुस्तकों (pustakbazaa.com) का लोकार्पण इस माध्यम की शक्ति और भविष्य का परिचायक है। आइए हम संकल्प करें कि नव वर्ष में हिन्दी साहित्य को तकनीकी के नए माध्यमों में प्रकाशित करेंगे, हम क्षितिज का बिन्दु नहीं प्रातःकाल का सूर्य बन कर उदय होंगे!

– सुमन कुमार घई


 

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