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प्रिय मित्रो,

पिछले दिनों एक स्थानीय मित्र का फोन आया। वह अपनी एक पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहती थीं।  उनका विचार था कि भारत से प्रकाशित/प्रिंट करवायी जाए। उन्होंने इंटरनेट पर एक ऑनलाइन प्रिंटर/प्रकाशक खोज रखा था। वह केवल यह जानना चाहती थीं कि क्या मैंने इस प्रकाशक का नाम पहले सुना हुआ है कि नहीं। उन्होंने मुझे वेबसाइट का नाम बताया और आग्रह किया कि मैं भी अच्छी तरह खोजबीन कर लूँ। मैंने वेबसाइट देखी और सब कुछ ठीक लगा। जो सामान्य रूप से होता है कि १०० पृष्ठों की पुस्तक के इतने पैसे और २०० पृष्ठों तक की पुस्तक के इतने पैसे इत्यादि। लेखक को पचास प्रतियाँ दी जाएँगी और पुस्तकों को बेचने के लिए दो-तीन वेबसाइट्स पर लिस्ट किया जाएगा इत्यादि। 

मैंने लेखिका को फोन पर बताया कि सब कुछ ठीक ही लग रहा है। लेखिका ने यक्ष प्रश्न पूछ लिया, “सुमन जी, पुस्तकें बिकेंगी क्या?” मैं निरुत्तर था। क्या कहूँ? 

अपने कई सम्पादकीयों में इसी विषय पर पहले भी लिख चुका हूँ। इस प्रश्न का उत्तर क्या है? हम भारतीय दुनिया भर की समस्याओं का उत्तर देने के लिए तत्पर रहते हैं। हर विषय के हम विशेषज्ञ हैं। अपने देश की सरकार से लेकर विदेशों की सरकारों की ग़लत नीतियों के समाधानों और सुझावों की फ़ेसबुक और सोशल मीडिया के अन्य स्थानों पर हमारी तूती बोलती है। परन्तु अगर कहीं यह प्रश्न पूछ लिया जाए जो मेरी मित्र लेखिका ने पूछा तो सभी चुप हो जाते हैं। समय-समय पर, कभी न कभी, कोई न कोई लेखक किसी न किसी ढंग से यह प्रश्न पूछ ही लेता है। हिन्दी के पाठक कहाँ हैं? हिन्दी की पुस्तकें बिकती क्यों नहीं? प्रश्न तो पूछा जाता है पर कोई विकल्प न तो सुझाया जाता है और न प्रस्तुत किया जाता है। इतनी निराशजनक स्थित क्यों है? इस समय भारत में क्या होता है यह तो मालूम नहीं; परन्तु मैंने अपने समय में भारत में उपन्यास ख़रीदे जाते भी देखें हैं और उपन्यासों की किराये की दुकानों पर भी ग्राहकों को प्रायः जाते हुए भी देखा है। अब पता नहीं यह नुक्कड़ के व्यवसायिक पुस्तकालय बचे हैं कि नहीं?

पिछले वर्ष इन दिनों मैं भारत में था। क्योंकि मैं भारत कई दशकों के बाद लौटा था तो मेरे लिए बहुत सी चीज़ें नई थीं, जिनमें एक पुस्तक प्रदर्शनियाँ थीं। दिल्ली की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक प्रदर्शनी के बारे में तो जानता ही था परन्तु पता चला कि कुछ प्रदर्शनियाँ निरंतर अलग-अलग शहरों में लगती रहती हैं। यानी पुस्तक प्रदर्शनी अपने आप में एक स्वतन्त्र व्यवसाय है। यह बात मैंने साहित्य कुञ्ज के प्रोग्रामर से सुनी क्योंकि वह एक सॉफ़्टवेयर मॉड्यूल इन्हीं लोगों के लिए बना रहा था। इसका अर्थ यह है कि यह कोई छोटा-मोटा व्यवसाय नहीं है। अगर दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो– व्यवसाय है तो इसका अर्थ है कि इसमें आर्थिक लाभ होगा। ऐसे प्रदर्शनियों के आयोजकों की आय के कई स्रोत हो जाते हैं। पुस्तकों कि बिक्री के अलावा स्टाल किराये पर देते होंगे। अगर प्रकाशक स्टाल लगाते हैं तो वह भी मुनाफ़े के लिए ही लगाते होंगे। इन प्रदर्शनियों में दर्शक भी विभिन्न वर्गों के होंगे। इनमें पाठक भी होंगे और लेखक भी होंगे। स्टाल्ज़ पर पुस्तकों का विमोचन करने वाले  साहित्यकार भी होंगे और फोटो खींचने वाले और समाचारों में प्रेस विज्ञप्तियाँ भेजने वाले लोग भी होंगे। विचार किया जाए यह प्रदर्शनियाँ अपने आप में एक जीवंत व्यवस्था लगने लगती है। अगर यह प्रदर्शनियाँ व्यवसायिक वर्ग के लिए पैसा कमा रही हैं तो लेखक कहाँ है? वह तो नहीं कमा रहा। परन्तु उसके कारण ही तो यह सब कुछ हो रहा है और विडम्बना है कि एक वही है जो पुस्तक प्रकाशन के पैसे देने के बाद भी ख़ाली हाथ ही घर लौटता है। ऊपर जब मेरी मित्र ने यक्ष प्रश्न पूछा और मैंने सोचा क्यों नहीं बिकतीं? बस यही प्रश्न है और इसी का उत्तर और समाधान चाहिए। किस तरह से लेखक इस मुद्रा अर्जन के तन्त्र का हिस्सा बन सके।

ऐसा नहीं है कि कोई भी हिन्दी का लेखक पैसा नहीं कमा रहा। कुछ तो हैं परन्तु वह एक हाथ की उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। 

इसका समाधान क्या हो सकता है? इसके भी कई पक्ष हैं जो दिखाई देते हैं। सबसे पहले तो लेखन की गुणवत्ता है। यह सबसे महत्वपूर्ण है और इसे समझने के लिए लेखक को पाठक के दृष्टिकोण से सोचने की आवश्यकता है। जब पाठक पैसा ख़र्च करके आपकी पुस्तक ख़रीद रहा है वह एक अच्छी पुस्तक ख़रीदना चाहता है। जो मनोरंजक हो, पढ़ने में आसान हो, जिसकी भाषा वह समझ सके, भाषा दोषरहित हो, व्याकरण सही हो, भाव इतने जटिल न हों कि केवल लेखक को ही समझ आएँ इत्यादि। और लेखक भी चाहेगा कि पाठक उसकी अन्य पुस्तकें भी ख़रीदना चाहे। इसके लिए परिश्रम और लग्न दोनों की आवश्यकता है। अध्ययन तो इसके मूल में होना ही चाहिए। दूसरा पक्ष है "सेल्समैनशिप"। यह बाज़ार का पहला नियम है। आपकी पुस्तक है तो आपको ही बेचनी है। प्रकाशक पर निर्भर नहीं रह सकते। इसके बारे में आप सोचें किस तरह यह संभव है क्योंकि यह स्थानीय मार्केट पर निर्भर करता है। प्रकाशक इस समय ड्राइवर सीट में बैठा है यानी सारी प्रक्रिया उसके हाथ में है। परन्तु प्रकाशक मूर्ख नहीं है, बहुत समझदार है। अगर वह आपको प्रयास करता देखेगा और उसे कमाई की संभावना दिखेगी तो वह अवश्य ही आपका सहायक भी बनेगा क्योंकि अंततः वह भी तो लाभ उठा रहा है। यह तय है कि एक बार सफल लेखक बनने के बाद आप उसके समकक्ष हो जाएँगे और तब यह आपका साझा दायित्व हो जाएगा।

तीसरा पक्ष स्थानीय है और यह पूरा आपकी साहित्यिक सक्रियता पर निर्भर करता है। आपको एक पाठक वर्ग तैयार करना चाहिए, एक साहित्यिक वातावरण तैयार करना चाहिए जिसमें हिन्दी पुस्तकें पढ़ना मनोरंजन का उच्चस्तरीय विकल्प हो। जिस तरह से लोग अँग्रेज़ी की पुस्तकों को अपनी शान बढ़ाने के दिखलाते हैं वैसे ही हिन्दी की पुस्तकों को भी दिखलाएँ। 

आप लोगों से भी अनुरोध कर रहा हूँ कि अगर इस विषय पर आपके विचार हों तो अवश्य लिख भेजें। अगले अंक के सम्पादकीय में वह भी सभी के लिए प्रस्तुत करूँगा।

– सुमन कुमार घई

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