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प्रिय मित्रो 


यह सम्पादकीय भारत में लिख रहा हूँ। मैं ११ फरवरी को भारत पहुँचा और १२ फरवरी की सुबह को दो दिनों के लिए अमृतसर के लिए निकल गया। हालाँकि मैं पंजाब में पला और बढ़ा परन्तु कभी अमृतसर नहीं जा पाया; शायद कम आयु में कैनेडा में चले आना इसका कारण रहा होगा।

अमृतसर में तीन प्रमुख स्थलों को देखा। पहला तो बाघा सीमा, और इसके अतिरिक्त दो अन्य स्थल जो मेरे दृष्टिकोण में कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे।

मुझे यहाँ कहने की आवश्यकता नहीं कि हरमंदिर साहब (स्वर्ण मंदिर) सबसे अधिक महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध पर्यटन/धार्मिक स्थल है। हरमंदिर साहब कई दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है। हम सब इसके धार्मिक महत्व को समझते हैं और इसके इतिहास से भी परिचित हैं। मेरा दृष्टिकोण साहित्यिक है। निम्नलिखित जानकारी मैं विकिपीडिया से ली है।

गुरु ग्रन्थ साहब, जो कि सिख धर्म का सबसे अधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, की रचना हरमंदिर साहब में ही हुई। गुरु ग्रंथ साहब का संपादन पाँचवें सिख गुरु अर्जुन (अरजन) देव जी ने किया जो कि अपने आप में अद्वितीय कोटि का है। “इसमें केवल सिख गुरुओं की वाणी ही नहीं बल्कि  ३० अन्य हिन्दू संत कवियों की रचनाएँ भी सम्मिलित की गईं। हिन्दू संत कवियों की वाणी को सम्मिलित करते हुए जात-पात को नकारते हुए जहाँ एक ओर  जयदेव और परमानंद जैसे ब्राह्मण भक्तों की वाणी को इस ग्रंथ में स्थान मिला वहाँ अछूत या नीची जाति के समझे जाने वाले संत कवियों जैसे कबीर, रविदास, नामदेव, सैण जी, सघना जी, छीवाजी, धन्ना की वाणी भी इसमें सम्मिलित की गई। हिन्दू और सिख गुरुओं के अतिरिक्त शेख फरीद के श्लोक भी इसमें सम्मिलित हैं।”

किसी भी धर्म का शायद ही कोई ऐसा ग्रंथ हो जिसमें भक्ति कालीन साहित्य को इस स्तर पर संग्रहीत किया गया हो। दशम्‌ गुरु गोविंद सिंह जी ने इसे अंतिम गुरु घोषित करके, इसमें सम्मिलित संत कवियों की वाणी को भी अमर कर दिया। यह भी एक अद्वितीय उदाहरण है साहित्य को अमर कर देने की। इस ग्रन्थ का रचना कार्य हरमन्दिर साहब परिसर में ही पूर्ण हुआ, जिसकी नींव गुरु राम दास जी ने रखी थी।

स्वर्ण मंदिर की स्थापत्यकला, और उसके अंदर हुई कारीगरी को देख कर, अचंभित होते हुए एक विचार शृंखला मस्तिष्क पर छाने लगी। इसकी तुलना मैं एक पर्यटक के दृष्टिकोण से ताजमहल से करने लगा। आँकड़ों के अनुसार स्वर्ण मंदिर में ताजमहल की तुलना में अधिक पर्यटक प्रतिदिन आते हैं। ताजमहल केवल एक बादशाह की बेगम का मक़बरा है जिसका कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है। अगर हम शाहजहाँ के जीवन का इतिहास देखते हैं तो उसने अन्य मुगल शासकों की तरह जनता की भलाई की ओर ध्यान देने की अपेक्षा अपने राज्य का विस्तार करने को महत्व दिया। जहाँ तक ताजमहल की स्थापत्य कला की बात है वह भी अब विवादास्पद होने लगी है। 

यह विचार मुझे उद्वेलित करते रहे - क्यों ताजमहल को इतना महत्व दिया जाता रहा है जबकि कई अन्य स्थल सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण हैं। और इन सबका शिरोमणी है हरमंदिर साहब। पूरे भारत के भक्ति कालीन साहित्य को- एक धर्म का आधार ही नहीं बल्कि उसे आदि ग्रंथ, अंतिम गुरु इत्यादि संज्ञाओं को संबोधित होने वाले ग्रंथ के सृजन स्थल को कम से कम साहित्यकारों के लिए महत्वपूर्ण होना ही चाहिए। हरमंदिर साहब कई बार मुस्लिम शासकों द्वारा ध्वस्त किया गया और हर बार पहले अधिक सुन्दर स्वरूप में फिर से निर्मित हुआ। 

कोई भी पर्यटक सिख समाज के सेवा भाव और विनम्रता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। गुरु राम दास की नगरी अमृतसर के इस मंदिर ने अध्यात्मिक स्तर, मानसिक स्तर पर मुझे स्नेह और आनन्द के अश्रुओं का उपहार दिया। जिसके लिए मैं कृतज्ञ हूँ उन गुरुओं का जिनकी विचारधारा ने ऐसे स्थल की रचना की। उन गुरुओं की विचारधारा का जिन्होंने भक्तिकालीन साहित्य को धर्म का आधार बनाते हुए राष्ट्रीय और धार्मिक एकता की दूरदर्शिता का परिचय दिया। वर्तमान का राजनैतिक घटनाक्रम हमें पुकार रहा है कि हम उन गुरुओं की दूरदर्शिता और भक्ति कालीन साहित्य में इन समस्याओं का समाधान खोजें।

अमृतसर के अन्य साहित्यिक महत्व को फिर चर्चा का विषय बनाऊँगा।

- सुमन कुमार घई

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