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एक व्यवसायिक प्रतिष्ठान का इतिहास

 हिस्ट्री ऑफ़ अ बिज़िनेस एंटरप्राईज़ : एंटॉन चेख़ोव (मूल लेखक)

अनुवादक : बी एम नंदवाना

अंद्रेई अंद्रेइच सिदोरोव को चार हज़ार रूबल अपनी माँ से विरासत में मिले, और उस रक़म से उसने एक बुक-स्टोर खोलने का निश्चय किया। इस तरह के स्टोर खोलने की नितांत आवश्यकता थी। सारा क़स्बा अज्ञानता और पूर्वाग्रह से जकड़ा हुआ था; बुज़ुर्ग लोगों के पास सार्वजनिक स्नानागारों में जाने के सिवाय और कोई काम नहीं था, सरकारी मुलाज़िम पत्ते खेलते और वोदका गटकते रहते, औरतें गप-शप में लगी रहतीं थी। युवक बिना किसी उद्देश्य के जी रहे थे, युवतियाँ कूटू की खिचड़ी खातीं और हर समय अपनी शादी के सपने देखा करती थीं। पति अपनी पत्नियों की पिटाई करते, और सुअर गलियों में घूमते रहते थे।

हमें आइडियाज़ चाहिएँ, बहुत सारे आइडियाज़, अंद्रेई अन्द्रेइच ने सोचा। आइडियाज़!

जब उसने उपयुक्त जगह किराए पर ले ली, अन्द्रेइच मास्को गया, वहाँ से वह बहुत ही अच्छी-अच्छी ज्ञानवर्धक, मनोरंजक किताबें लेकर लौटा, क्लासिकल और प्रख्यात आधुनिक लेखकों की, साथ ही बहुत-सी पाठ्य-पुस्तकें भी। उसने सारा सामान क़रीने से शेल्फ़ों पर जमा दिया। पहले तीन सप्ताह के दौरान एक भी ग्राहक नहीं आया। अंद्रेई अन्द्रेइच काउंटर के पीछे बैठा मिखैलोव्यस्की को पढ़ता रहता और ईमानदारीपूर्वक सोचता रहता। उदाहरण के तौर पर, उसे इस बात का अहसास कब होगा कि ब्रीम-मछली के साथ कुछ दलिया खा लेना कोई बुरा आईडिया नहीं है। फिर वह स्वयं से कहता, ‘ओह यह कितना तुच्छ विचार है।’ 

रोज़ सुबह एक मज़दूर लड़की माथे पर रूमाल बाँधे, पैरों में रबर के जूते पहने, ठण्ड से ठिठुरती, भागती हुई आती और कहती- ‘हमें दो कोपेक का सिरका दो।’

और अंद्रेई अन्द्रेइच तिरस्कार से कहता- ‘तुम दुकान भूल गयी हो, मैडम! तुम ग़लत जगह आ गयी हो!’

जब उसका कोई दोस्त उससे मिलने आता, वह अपने चेहरे पर एक प्रभावशाली और रहस्यपूर्ण एक्सप्रेशन ले आता और सबसे ऊपर की शेल्फ़ से पिसारेव  का तीसरा ग्रन्थ उठाता, उसे झाड़ता-पोंछता, और चेहरे पर इस तरह के भाव लाता कि उसके स्टोर में और भी कुछ है जिसे वह बताने से हिचक रहा है, वह कहता:

‘हाँ श्रीमान्, यह छोटी-सी किताब, क्या कहूँ? सही कह रहा हूँ...वास्तव में .. तुम इसे पढ़ना शुरू करोगे तो बिना पूरी किये नहीं छोड़ोगे।’

तीन सप्ताह के बाद पहला ग्राहक आया। वह सफ़ेद बालों वाला स्थूलकाय व्यक्ति था। उसके मूँछें थीं और उसने टोपी पहन रखी थी, जिसके चारों ओर लाल पट्टी थी – उसकी वेशभूषा और हावभाव से वह एक ज़मींदार लग रहा था। उसने आवर नेटिव टंग के दूसरे भाग की माँग की।

‘क्या तुम्हारे पास स्लेट-पेन्सिल हैं?’

‘नहीं, हम ऐसी चीज़ें नहीं रखते हैं।’

‘अफ़सोस....यह बहुत बोरिंग है कि एक छोटी-सी चीज़ के लिए पूरा बाज़ार घूमना पड़ता है।’

वास्तव में यह अफ़सोस की बात है कि मैं स्लेट-पेंसिल नहीं रखता, जब ग्राहक चला गया तो अंद्रेई अन्द्रेइच ने विचार किया। यहाँ इन प्रांतीय क़स्बों में केवल किताबें रखकर एक सीमा में बँधे रहने का कोई मतलब नहीं है। उसे वह सब बेचना चाहिए जो शिक्षा से सम्बंधित हो या जो किसी भी प्रकार से उसके प्रचार-प्रसार में उपयोगी हो। उसने मास्को चिट्ठी लिखी, और एक महीने के अन्दर उसके स्टोर की शेल्फ़ों पर पेन, पेंसिल, पेन-होल्डर, स्लेट, नोट-बुक और स्कूल के दूसरे सामान की सजावट हो गयी। छात्र और छात्राएँ आने लगे और वह दिन भी आया जब उसकी कमाई एक रूबल और चालीस कोपेक की हो गयी। एक दिन रबड़ के जूते पहने, ठण्ड में ठिठुरती हुई वह मज़दूर लड़की, भागी-भागी उसकी दुकान पर आयी; उसने यह कहने के लिए मुँह खोला ही था कि वह ग़लत जगह पर आ गयी है, वह ज़ोर से चिल्लाई: 

‘मुझे एक कोपेक की पेपर-शीट और सात कोपेक का स्टाम्प दो!’

उसके बाद अंद्रेई अन्द्रेइच स्टाम्प और साथ में प्रार्थना-पत्र भी रखने लगा। दुकान खुलने के क़रीब आठ महीने बाद एक महिला पेन ख़रीदने आई। ‘कोई अच्छा-सा स्कूली-बस्ता दिखाईये।’

‘ओह मैडम, मेरे पास नहीं है। हम नहीं रखते हैं।’

‘बड़े अफ़सोस की बात है! अच्छा तो आप किस प्रकार की डॉल्स रखते हैं? दिखाईये, पर ज़्यादा महँगी न हों।’

‘मेरे पास डॉल्स भी नहीं हैं, मैडम,’ अंद्रेई अन्द्रेइच ने उदास होकर कहा।

बिना देरी किये, उसने मास्को चिट्ठी लिखी, और जल्दी ही उसकी दुकान में स्कूली-बस्ते, डॉल्स, ढोल-दुन्दुमी, कृपाण, एकार्डियन, गेंदें, तरह-तरह के खिलौने दिखाई देने लगे।

‘ये सब मामूली चीज़ें हैं,’ उसने अपने मित्रों से कहा। ‘बस तुम थोड़ा इन्तज़ार करो, मैं शिक्षात्मक खिलौनों और शिक्षाप्रद खेलों की एक पूरी शृंखला की शुरुआत करने वाला हूँ। तुम देखना मेरी दूकान में अलग से एक शिक्षा- सम्बन्धी एक सेक्शन होगा – संक्षेप में ...विज्ञान के सूक्ष्मतम प्रयोगों पर आधारित। उसने क्रोके, चोरस, बैगा टेल (विभिन्न प्रकार के खेल), डंबल, बच्चों के बाग़वानी के उपकरण, और क़रीब दो दर्जन बहुत ही निपुण शिक्षाप्रद खेलों का आर्डर दिया। कुछ दिनों बाद, उसकी दुकान से गुज़रते हुए, क़स्बे के रहवासियों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने वहाँ दो बाई-साइकिलें देखीं - एक बड़ी और दूसरी थोड़ी छोटी। और उसका व्यापार चल निकला। क्रिसमस के दिनों में कारोबार अच्छा चला, अंद्रेई अन्द्रेइच ने दुकान के बाहर नोटिस लगा दिया था – ‘हमारे यहाँ क्रिसमस ट्री की सजावट का सामान रियायती दरों पर उपलब्ध है।’

‘तुम देखना, मैं उनके लिए स्वच्छता सम्बन्धी सामान भी लाने वाला हूँ,’ उसने हाथों को मलते हुए, अपने दोस्तों से कहा। ‘बस मुझे एक बार मास्को जाने दो! मैं ऐसे फ़िल्टर और हर तरह के वैज्ञानिक रूप से उन्नत मॉडल लाऊँगा जिनकी, तुम लोगों ने कल्पना तक नहीं की होगी! विज्ञान की उपेक्षा हरगिज़ नहीं की जा सकती, मेरे दोस्तो, बिलकुल नहीं!’ 

अच्छी-ख़ासी रक़म कमाने के बाद वह मास्को गया और - नक़द में और उधार पर – करीब पाँच हज़ार रूबल का माल ख़रीद कर लाया, जिसमें फ़िल्टर थे, लिखने की मेज़ के बहुत ही ख़ूबसूरत लैंप, गिटार, बच्चों के लिए स्वास्थ्यकर जाँघिये, दूध पिलाने की बोतलें, और बटुए, और जीव-जंतुओं से सम्बंधित वस्तुएँ थीं। वहाँ से निकलते समय उसने पाँच सौ रूबल की बेहतरीन क्वालिटी की चीनी मिट्टी की क्रोकरी भी ख़रीद ली, और अपनी इस ख़रीद पर वह बहुत ही ख़ुश हुआ, क्योंकि सुन्दर वस्तुएँ परिष्कृत रुचि को विकसित करती हैं और तौर-तरीक़ों में शालीनता लाती हैं। मास्को से लौटने के बाद वह नई ख़रीदी वस्तुओं को शेल्फ़ों और किताबों की अलमारियों में व्यवस्थित करने में लग गया। जब वह सबसे ऊँचीं शेल्फ़ के टॉप को साफ़ करने के लिए ऊपर चढ़ा, उसी समय कुछ हिला, और एक के बाद एक मिखैलोव्यसकी के दस वॉल्यूम शेल्फ़ से गिर पड़े; एक किताब तो उसके सिर पर आ गिरी और दूसरी किताबें सीधी लैंपों पर गिरीं और दो लैंप-ग्लोबस टूट गए।
उसने सारी किताबों को इकट्ठा किया और डोरी से कस कर बाँधा और काउंटर के नीचे छिपा दिया। क़रीब दो दिनों के बाद उसे किसी ने बताया कि पास वाली किराणे की दूकान के मालिक को अपने भतीजे पर हमला करने के आरोप में दो साल की सश्रम कारावास की सज़ा हो गयी है और इसलिए वह दुकान किराए पर उठनी है। अंद्रेई अन्द्रेइच बहुत ख़ुश हुआ और उसने उस मौक़े को हाथ से नहीं जाने दिया। तुरंत ही दीवार के बीच एक खिड़की निकाल दी गयी और दोनों दुकानों में, जो अब एक हो गईं थीं, सामान ठसाठस भरा हुआ था; जो ग्राहक दूकान के दूसरे भाग में जाते वे सब आदतन चाय, शक्कर और केरोसिन की माँग करते थे, अंद्रेई अन्द्रेइच ने बिना किसी कठिनाई के किराणे का सामान भी बेचना आरम्भ कर दिया।

अब वह हमारे क़स्बे के प्रमुख व्यापारियों में से एक है। वह चाइना की क्रोकरी, तम्बाकू, तारकोल, साबुन, पावरोटी, अंगूरी शराब, सिलाई के काम आने वाली वस्तुएँ, झाड़-फानूस, राइफ़ल, चमड़ा, सूअर का सूखा मांस आदि बेचता है। उसने मार्केट में एक शराबघर भी ख़रीद लिया है। ऐसी अफ़वाह है कि वह पब्लिक-स्नानागार और होटल भी खोलने वाला है। जहाँ तक किताबों का सवाल है, जो किसी समय शेल्फ़ की शोभा बढ़ाती थीं, वे – ‘पिसारेव’ के तीसरे वॉल्यूम समेत बहुत पहले एक रूबल और पाँच कोपेक प्रति सौ भार-यूनिट के हिसाब से बेच दी गयी हैं। 

जन्म-दिवस की पार्टियों और शादियों में, उसके पूर्व-मित्र, जिन्हें अंद्रेई अन्द्रेइच अब उपहास में ‘अमेरिकी’ कहता है, कभी-कभार बातचीत के दौरान विकास, साहित्य और इसी तरह के दूसरे उच्च-स्तर के विषयों को उठाते रहते हैं।

‘अंद्रेई अन्द्रेइच क्या तुमने यूरोपियन हेराल्ड का ताज़ा अंक पढ़ा है?’ वे उससे पूछते हैं।

‘नहीं मैंने उसे नहीं पढ़ा है.....’ आँखों को घुमाते हुए और अपनी घड़ी की मोटी सोने की चैन से खेलते हुए, वह जवाब देता है। ‘इसकी हमें चिंता नहीं है। हम इससे अधिक रचनात्मक व्यवसाय में संलग्न हैं।’

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