प्रिय मित्रो,
इस समय कैनेडा में 15 जून के रात्रि के लगभग 9 बज चुके हैं। अभी तक मैं साहित्य कुञ्ज का अंक प्रकाशित नहीं कर पाया हूँ। पिछले एक घंटे से एक ही प्रश्न से जूझ रहा हूँ कि इस बार सम्पादकीय किस विषय पर लिखूँ? मस्तिष्क एक सपाट कोरे पन्ने की तरह हो रहा है। कुछ भी सूझ नहीं रहा। कम से कम साहित्य से सम्बन्धित तो कुछ भी नहीं। फिर भी लिखना तो कुछ पड़ेगा ही।
मेरे कम्प्यूटर की मेज़ दूसरी मंज़िल के एक कमरे की खिड़की से सामने है। बाहर अभी अंधेरा नहीं हुआ है। अभी दिन बड़े हो रहे हैं इसलिए आज सूर्यास्त का समय 8:40 था। अभी मद्धम सा प्रकाश अभी भी बिखरा है। जब मैं अपनी खिड़की से बाहर देखता हूँ तो दाहिनी ओर फ़र (Spruce) के तीन पेड़ हैं। लगभग ग्यारह वर्ष पहले जब हम इस घर में आए तो इन पेड़ों शाखाएँ धरती को और एक-दूसरे की शाखाओं को भी छूती थीं। इस तरह इन पेड़ों के त्रिकोण के भाग में एक ख़ाली जगह बच जाती थी। दूसरी ओर मुख्य सड़क के साथ के घास के मैदान पेड़ों के बीच तार की फ़ेंस लगी हुई है। फ़ेंस लाँघ कर इस ख़ाली जगह पर आया जा सकता था। इस ख़ाली जगह पर क्या होता है—सड़क से दिखाई नहीं देता था। एक दिन मैंने जिज्ञासावश देखने का प्रयास किया तो देखा कि शराब की ख़ाली बोतलों का ढेर लगा हुआ था। अर्थात् मेरे घर के ठीक सामने अवैध गतिविधियाँ चल रही थीं। अवैध इसलिए कि यहाँ के समाज के नियमों के अनुसार शराब पीना बुरा नहीं समझा जाता तो फिर इस स्थान पर अगर कोई छिप कर शराब का सेवन कर रहा है निश्चित रूप से छिप कर ही कर रहा है। नहीं तो मच्छरों की भिन-भिन में छिप कर कोई क्यों शराब पिएगा? प्रश्न और उत्तर दोनों स्वाभाविक थे। अब मैंने नज़र रखनी शुरू की तो देखा कि पंद्रह-सोलह वर्ष के बच्चों की एक टोली प्रतिदिन फ़ेंस की दूसरी ओर सड़क के किनारे शाम ढलते ही जुटने लगती है। पेड़ों के बीच बनी यह जगह ही इन बच्चों का पार्टी-रूम था। क्योंकि यह सबकुछ नगरपालिका की भूमि पर हो रहा था इसलिए मैं इन्हें टोक नहीं सकता था। इन किशोरों के साथ मैं भिड़ना भी नहीं चाहता था। मैंने नगरपालिका के कार्यालय में फोन करके अपनी समस्या बतायी। उन्होंने ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनी और मुझे आश्वासन दिया कि वह शीघ्र ही इसका समाधान ढूँढ़ निकालेंगे। उसी दिन शाम के समय पुलिस के दो ऑफ़िसर मेरे साथ बात करने के लिए आए। मैंने उन्हें जगह और बिखरी बोतलें दिखाईं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि क्या मैं इन किशोरों के रंग में भंग डालना चाहता हूँ। संभवतः किशोरावस्था में वह भी ऐसी गतिविधियों में लिप्त रहे हों। फिर गंभीर होते हुए उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया और कहने लगे कि इस छिपी हुई जगह में कोई अपराधी छिप भी सकता है और ड्रग्स के क्रय-विक्रय की गतिविधियाँ भी हो सकती हैं। दो दिन के बाद नगरपालिका के कुछ कर्मचारी आए। उन्होंने तीनों पेड़ों की नीचे की शाखाएँ काट दी। नीचे की भूमि पर उगी खर-पतवार को साफ़ किया और घास का बीज डाल दिया। कुछ दिन में घास उग आई और यह छोटा-सा मैदान इतना सुंदर लगने लगा कि सैर करने वाले लोग प्रायः रुकते और मुझे धन्यवाद देते कि मेरी एक फोन काल से एक ऐसी समस्या का निदान हो गया जिसे देखते तो सभी थे पर कोई कुछ करना नहीं चाहता था। हालाँकि इस जगह की घास काटने का दायित्व नगरपालिका था जो महीने में एक बार आते थे। मैंने हर सप्ताह अपने लॉन के साथ ही इसे भी काटना आरम्भ कर दिया। इसका परिणाम यह निकला कि जो लोग अपने कुत्तों को यहाँ शौच के लिए लाते थे, उन्होंने आना बंद कर दिया।
कहना यह चाहता हूँ कि हम सब लोग अपने आसपास के समाज को बदल सकते हैं। इसके लिए न तो कोई नारेबाज़ी की आवश्यकता होती है न ही किसी आन्दोलन की। बस सजग रहें, नियमों का पालन करें और व्यवस्था को समझ कर सही जगह पर आवेदन करें। अवश्य कोई न कोई तो आपकी बात सुनेगा ही।
देखिए स्क्रीन के सामने बैठा तो कुछ तो लिखा गया चाहे यह साहित्यिक नहीं है। वैसे यह आवश्यक तो नहीं है कि मित्रों के साथ केवल साहित्य की ही बात की जाए!
—सुमन कुमार घई
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Lakhan lal pal 2026/06/16 03:47 PM
'यह आवश्यक तो नहीं है कि मित्रों के साथ केवल साहित्य की ही बात की जाए' संपादकीय शीर्षक यह इंगित करता है कि संपादकीय में विषय विविधता होती है। विषय कोई भी हो सकता है। बस उसकी शैली, शिल्प और विचार पाठक को लुभाते रहें। साहित्य कुञ्ज एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका है। इसीलिए उसका क्षेत्र सीमित नहीं हो सकता है। विविधता होनी चाहिए। मानक विषय अंतरराष्ट्रीय हों। साहित्य के साथ राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, विज्ञान तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी से संबंधित विषय लिए जा सकते हैं। संपादकीय विषय में लेखक ने अपने निजी अनुभव को आधार बनाया है। इसलिए यह संस्मरण के अधिक निकट प्रतीत होता है। विशिष्टता यह है कि इसमें आत्मप्रशंसा न होकर एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका अधिक दिखाई देती है। समाज हित में आपके द्वारा एक व्यक्तिगत पहल की गई है। इस पहल ने न केवल अपने आस-पास की अनियमित व अवांछित गतिविधियों पर रोक लगवाई बल्कि नगरपालिका का साफ-सफाई की ओर ध्यानाकर्षण भी कराया है। उसका परिणाम सफल व सुखकारी रहा। लोग उस पार्क में अब घूमने आने लगे। सुबह की सैर ने सुप्त पड़े उस वातावरण को जीवंत बना दिया। जो स्थान अनुपयोगी था उसे न केवल उपयोगी बनाया बल्कि उसे आकर्षण का केंद्र भी बनाया। आपके द्वारा की गई यह पहल स्वागत योग्य है। वैसे एक संपादक को नया संपादकीय लिखने का मानसिक चैलेंज बना रहता है। साथ ही उसमें खरा उतरने की जिम्मेदारी भी। मेरे हिसाब से जहां लोक-मंगल की भावना हो,वह उपयोगी है और उत्तम भी। लोकहित से जुड़ा यह संपादकीय एक सकारात्मक संदेश देता है।