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ISSN 2292-9754

पूर्व समीक्षित
वर्ष: 23, अंक 301, सितम्बर प्रथम अंक, 2026

संपादकीय

मेरे बहाने और इक्कसवीं सदी की कहानियाँ विशेषांक
सुमन कुमार घई

प्रिय मित्रो, एक लम्बे अंतराल के बाद साहित्य कुञ्ज की ओर लौटा हूँ। यह खेद तो है कि मेरी व्यस्तताओं के कारण आपकी रचनाओं का यथा समय प्रकाशन नहीं हो पाया, परन्तु मैं भी एक सामाजिक प्राणी हूँ और कुछ सामाजिक और पारिवारिक दायित्व ऐसे भी होते हैं जिन्हें निभाना ही होता है। एक अन्य कारण मेरी बाग़बानी में रुचि भी है। आप सभी जानते हैं कि मैं कैनेडा के ओंटेरियो प्रांत में रहता हूँ। यहाँ पर वास्तविक गर्मी की ऋतु बहुत छोटी होती है। कहने को कैलेण्डर के अनुसार कैनेडा में ग्रीष्म ऋतु जून २० या २१ को आरम्भ हो जाती है और सितम्बर के प्रथम सप्ताह...

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साहित्य कुञ्ज के इस अंक में

कहानियाँ

अपूर्ण विराम
|

  नगर निगम का बुलडोज़र ठीक आठ बजे पहुँचा।…

इलाज
|

  छुट्टन की उल्टी ही नहीं रुकती। हर…

ऊँची छलाँग 
|

  जब एक बड़े शहर के जाने-माने अस्पताल…

और प्रेम मरता गया
|

  जिस प्रेम के लिए उन्होंने पूरा संसार…

कफ़न
|

  मूल लेखक: बानू मुश्ताक अंग्रेज़ी में…

गुंडे कहीं के
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  शरदनाथ खरे साहब ने ऑफ़िस के बाहर निकलते…

गेंदा रानी
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  ड्यूटी रजिस्टर में अपने हस्ताक्षर…

चुनौती
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  तीन-चार दिनों से स्वास्थ्य ठीक नहीं…

त्याग की अंतिम क़ीमत
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  मेरे पिताजी छह भाई-बहनों में सबसे…

पत्थर पूजै हरि मिले . . . 
|

  आज सुबह पाँच बजे ही पुष्पा की नींद…

पिता का तकिया
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  मेरी कॉलोनी में रहने वाले एक वृद्ध…

प्रेम धरो
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  वाराणसी से कोई मिलने आया? अपने अभिवादन…

बंद घड़ी
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  पुराने मकान की सफ़ाई करते समय बेटे…

बीते रिश्तों की ख़ुश्बू 
|

  पुराने घर की छत पर रखा वह लकड़ी का…

मुस्कान का उत्तर
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  सम्मान समारोह में जब मंच से उसका…

योनि का चुनाव
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  एक जीव ईश्वर के सम्मुख हाथ जोड़कर…

लक्ष्मी का विरह
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  रथ चला . . . शंख बजे, घंटियाँ बजीं,…

सज़ा
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  एक कुम्हार ने कोई अपराध कर दिया था।…

समीर अंकल
|

  सावन महीने की रिमझिम बारिश के बाद…

हसीन सपने
|

  वह बेरोज़गार था। लेकिन उसने अफ़सरशाही…

हस्ताक्षर
|

  वृद्धाश्रम में रहने वाले एक बुज़ुर्ग…

हास्य/व्यंग्य

मानसून का गधा
|

  मेरा मोहल्ला पढ़ा-लिखा होने के बाद…

मैं दिमाग़ी पैदल हूँ
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  हमारे महल्ले में हफ़्तों पानी आए या…

आलेख

कारण मनमुटाव के
|

  जब एक व्यक्ति किसी ‘अपने’…

समीक्षा

उपन्यास ‘अलकनन्दा सुत’ पर एक समीक्षात्मक दृष्टि
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पुस्तक: अलकनन्दा सुत लेखिका: अर्चना पैन्यूली विधा: उपन्यास प्रकाशक: वाणी…

मराठी पुस्तक परिचय
|

   (गजाआडच्या कविता)  (जेल के क़ैदियों की कविताएँ)  …

मायाजाल: एक विशिष्ट चिन्तन की कृति
|

समीक्षित पुस्तक: मायाजाल (कहानी संग्रह) लेखक: दिव्या माथुर समीक्षक: विजय…

सूक्ष्म अनुभूतियों की रश्मियों से निस्सृत वृहद विचार—कब टूटेंगी चुप्पियाँ
|

पुस्तक: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा- संग्रह) लेखक: डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’…

अन्य

कविताएँ

अंतिम प्रश्न
|

  मरने से पहले उस आदमी ने अपने बेटे…

अंतिम मित्र
|

  आख़िरी दोस्त आख़िरी उम्मीद हो तुम। …

अदृश्य दरारें
|

  उसके बाल अभी भी रात जैसे स्याह हैं,…

अपने आप से घबरा गया हूँ
|

  अपने आप से घबरा गया हूँ,  छाया…

अपूर्व प्रेम 
|

  रोज़ झुक जाता हूँ मैं शिव के आगे …

अभी शेष है
|

 भँवर से आँख मिलने का साहस अभी शेष है,…

अशिष्टों की औक़ात
|

उनकी अशिष्ट भाषा ने  तुमको चोट पहुँचायी…

आक के पौधे पर फूल आ गए हैं
|

आक के पौधे पर फूल आ गए हैं।  मायूस…

आख़िर क्यों? 
|

  आधुनिकता की लहर में, खो गईं संवेदनाएँ…

आशावरी
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  (सॉनेट)   जिस मरु की अपेक्षा…

इस निशा में
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मूल सॉनेट (आजि राति रे): सॉनेटियर गिरिजाकुमार…

उत्तराधिकारी
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  हमने अपने बच्चों को घर दिए, ज़मीन…

उसी तरह 
|

  मैं छूकर देखता हूँ,  ये पानी…

एक घर की आत्मकथा
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  मेरा जन्म किसी अस्पताल में नहीं हुआ…

एक पुरुष
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  एक पुरुष ने हाड़ तोड़ मेहनत से अपने…

एक पेड़ की गवाही
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  यदि कभी इस गाँव का इतिहास लिखा जाए,…

ओ डॉक्टर!
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(वैश्विक महामारी के कठिन दौर में डॉक्टर्स…

ओलम (अनन्त प्रेम) 
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  जी रहा हूँ जीवन  बड़ी ही शिद्दत…

कितने प्यारे थे वो दिन
|

  कितने प्यारे थे वो दिन, धमा-चौकड़ी…

घुटन
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  करूँगा शिकायत रब के दर पर  जिन्होंने…

छिपकली
|

  कल रात मैंने दीवार पर चिपकी एक छिपकली…

ज़िंदगी कहती है
|

  पथरीली, टेढ़ी-मेढ़ी यह ज़िंदगी, …

जो लौटकर नहीं आता 
|

  ऋतुएँ हर वर्ष अपना कैलेंडर लेकर लौट…

जोंक
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  न हटती है न काटती है बस चिपक गयी…

झुकी आम की डाली देखो
|

  झुकी आम की डाली देखो, आधी डूबी ताल। …

तरंगांतरंग . . . 
|

तरंगांतरंग . . .  भँवर से जूझकर नहीं…

दिव्य अनुराग
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  जन्म जमांतर की मेरी अतृप्त इच्छाएँ…

निश्चल संवेदना
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  बदलते वक़्त के साथ  बहुत कुछ…

निष्ठुर समय
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  भरी दुपहरी में यौवन से भरपूर एक युवती…

नेपाल-त्रासदी
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  थोड़ी देर रो लूँ इस त्रासदी पर, …

पक्ष के पार
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  इन दिनों तुम्हारा हाथ थामना सबसे…

परदा
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  बड़े काम का परदा पी.एम. आएँ परदा सी.एम.…

पहला सफ़र
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  ट्रेन सुरमयी लग रही है।  पर…

प्रतीक्षा की लौ
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  इतिहास की सबसे लंबी चुप्पियों में…

प्रमाण
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  आजकल हर आदमी अपने होने का प्रमाण…

प्रेम शायद ऐसा ही होता है
|

  किसी के जीवन में शोर की तरह नहीं, …

बचपन और बेबसी
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  खिलौने खेलने की उम्र में वह खिलौने…

बदली राहें, बदले दोस्त
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  दोस्त होते हैं सच्चे निस्वार्थ प्रेम…

भूत
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  आज गाँव में जहाँ भी देखो  भूत…

मनुष्य गढ़े जाते हैं
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  कौन जन्मता है पाप लिए?  कौन…

मशीन बना दिया गया शिक्षक 
|

  कुछ अकर्मण्य हाथों की धूल पूरे आकाश…

माँ-बाप
|

  जो जीवित माँ-बाप वृद्धाश्रम में भेजे…

मृत लोगों की वस्तुएँ कहाँ जाती हैं?
|

  दादा के मरने के बाद घर में सबसे ज़्यादा…

मेरी योग्यता-अयोग्यता पर चुप हो
|

  अब नहीं मिलोगी घर पर, घर की गूँज…

मैं मुस्कुरा रहा हूँ
|

  मैं मुस्कुरा रहा हूँ,  तुमसे…

मौन - 1
|

  सब बोल रहे थे। इतना बोल रहे थे कि…

यवनिका
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  (सॉनेट)   निशीथ की निविड़ता में…

रसोई से धूप तक
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कई दिनों से तुम मेरे उठने से पहले जाग जाते…

वह जब बोलती है
|

  वे चाहते हैं स्त्री नदी बनी रहे बहती…

विस्मृतियों का भूगोल
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  साँस तो चलती है, पर जीना भूल जाते…

वे किसान
|

  किसानों की बस्ती है ईमानदारी का मेहनत…

वो सपने गुज़र गए
|

  सपने ज़रूरी हैं ख़ुद को बहलाने को! …

शख़्स
|

  एक शख़्स है  जो तुम्हारे इंतज़ार…

शेष ही शाश्वत है
|

  न आना तुम्हारा चयन था न जाना। कोई…

संदूक के भीतर मैं
|

  मेरे घर के सबसे अँधेरे कोने में एक…

सभ्यता
|

  सभ्यता ने कहा— मैं आगे बढ़…

स्त्री एक कहानी
|

  स्त्री वह हस्ताक्षर है,  जिसके…

हारे लोग
|

  हारे लोग थके से लगते हैं   जीवन…

हे नवांकुरो
|

हे नवांकुरो!  घबराना मत लिखते रहना…

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शायरी

आँखों से दिल को धड़काना
|

  नज़र से नज़र को मिलाना, आँखों से दिल…

आसार
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  मुझे नफ़रत ज़रा  सोच समझ कर करना…

एक ग़म का फ़साना है
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  एक ग़म का फ़साना है,  एक दिल का…

सवालों से बदलाव तक
|

  बेज़ुबान भी लफ़्ज़ बयाँ करने लगे,…

कवि, स्वर, चित्र और निर्माण: अमिताभ वर्मा

उसका क्या

अमिताभ वर्मा की भावपूर्ण अभिव्यक्ति। उच्चारण से ’क्या’ शब्द के कितने भाव प्रस्तुत हुए—सुनें—उन्हीं…

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डॉ. आरती स्मित (विशेषांक संपादक)

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